स्कूलों के फिर से खुलने की तैयारियों के बीच अभिभावक चिंतित, विशेषज्ञों की सावधानी बरतने की सलाह

नई दिल्ली: गृह मंत्रालय ने 29 अगस्त को अनलॉक 4 के लिए गाइडलाइन जारी की थी जिसमें 21 सितंबर से स्कूलों को आंशिक रूप से खोलने की अनुमति देना शामिल है.

गाइडलाइन में कहा गया है, ‘कक्षा 9 से 12 के छात्रों को अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन के लिए स्वैच्छिक आधार पर अपने स्कूल जाने की अनुमति दी जा सकती है लेकिन यह व्यवस्था सिर्फ कंटेनमेंट जोन से बाहर वाले क्षेत्रों के लिए होगी.’

छात्रों को अपने माता-पिता से पूर्व लिखित सहमति के बाद ही स्कूल जाने की अनुमति होगी और केवल 50 प्रतिशत टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ को बुलाया जाएगा.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से घोषित एसओपी के अनुसार स्कूलों में कम घंटे, सीमित क्षमता, मास्क और सैनिटाइजर आदि मानकों का पालन करना होगा.

सीरोलॉजिकल सर्वे बताता है बच्चों को कोविड से खतरा ज्यादा

अध्ययनों से पता चला है कि वयस्कों की तुलना में बच्चों के गंभीर रूप से कोविड-19 पीड़ित होने की संभावना कम होती है. लेकिन संक्रमित होने पर वे बीमारी के एसिम्प्टोमैटिक वाहक बन सकते हैं.

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अगस्त में हुए दिल्ली के दूसरे सीरोलॉजिकल सर्वे में पता चला कि 5-17 आयु वर्ग के लगभग 35 प्रतिशत बच्चों में एंटीबॉडी का टेस्ट पॉजिटिव है- जो बाकी किसी भी उम्र वर्ग के प्रतिभागियों से अधिक था. इंदौर के सर्वेक्षण में बच्चों में सीरोप्रिवेलेंस करीब 7 प्रतिशत पाया गया जो वयस्कों के ही समान था.

ये संख्या बताती है कि स्कूल बंद रहने के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चे संक्रमण का शिकार हुए हैं. फिर भी, कुछ विशेषज्ञों ने इस आधार पर स्कूलों को फिर से खोलने का स्वागत किया है कि बच्चों में पहले से ही एंटीबॉडी विकसित हो चुकी है.

भारत स्कूल फिर से खोलने वाला पहला देश नहीं होगा. अमेरिका ने अगस्त की शुरुआत में स्कूल खोल दिए थे और दो हफ्ते के भीतर ही पाया गया कि बच्चों में कोविड के मामले 90 फीसदी बढ़ गए. अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स एंड द चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट में बताया गया कि फिर से खुलने के कुछ ही दिनों बाद फ्लोरिडा, जॉर्जिया और मिसिसिपी स्कूल कोविड क्लस्टर बन गए.

इजराइल ने मई में कोविड मामलों में कमी के बाद अपने स्कूलों को फिर से खोला लेकिन कुछ ही हफ्तों के भीतर हजारों की संख्या में छात्रों और शिक्षकों को क्वारेंटाइन में भेजना पड़ गया. इसी तरह जर्मनी ने बर्लिन के 825 में से 41 स्कूलों में फिर खुलने के दो हफ्ते बाद ही कोविड मामलों में वृद्धि देखी.

इस सबको देखते हुए सवाल उठता है कि क्या भारत स्कूलों को सामान्य तौर पर खोलने के लिए तैयार है जहां 44 लाख से ज्यादा कोविड मामले सामने आ चुके हैं और इसमें किसी तरह की कोई कमी आने के संकेत नहीं हैं.


 


विशेषज्ञों ने दी सावधानी बरतने की सलाह

ग्लोबल हेल्थ, बायोएथिक्स और स्वास्थ्य नीति शोधकर्ता अनंत भान की राय है कि जिन जगहों में घरों तक इंटरनेट की पहुंच नहीं है, स्कूलों को खोलना उपयोगी हो सकता है लेकिन इस कदम के साथ कुछ जोखिम हैं.

उन्होंने कहा, ‘दुनिया भर के देश स्कूल खोलने का सबसे अच्छा तरीका खोजने में जुटे हैं. मौजूदा गाइडलाइन के साथ यह जरूरी है कि जिलाधिकारी सख्त निगरानी की व्यवस्था करें ताकि स्कूल कोविड क्लस्टर न बन जाएं.’

इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च के एक सीरोलॉजिकल सर्वे में शहरी क्षेत्रों में सीरोप्रिवेलेंस उच्च स्तर पर पाया गया, जो शहरों में संक्रमण दर उच्च होने को दर्शाता है. इस पर बात करते हुए भान ने कहा, ‘सबसे पहले कम संक्रमण दर वाले क्षेत्रों में स्कूल फिर से खोलने के प्रयास करने चाहिए और एक बार सफलता दर का पता चल जाए तब मुंबई और दिल्ली जैसे उच्च संक्रमण वाले क्षेत्रों में स्कूल खोले जाने चाहिए.’

इसी विचार का समर्थन करते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. आनंद लक्ष्मण ने लिखा, ‘पूरे देश में एक साथ स्कूल खोलने के बजाए विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पीक टाइम और प्रसार दर के अंतर को देखते हुए नीति बनाई जानी चाहिए, हमें संबंधित राज्यों, नगर पालिकाओं और पंचायतों को अपने यहां पीक टाइम, पॉजिटिविटी रेट, मृत्य दर और सीरो-प्रिवेलेंस के आधार पर निर्णय लेने की स्वतंत्रता देनी चाहिए.

दूसरी तरफ, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया में लाइफकोर्स एपिडमोलॉजी के प्रमुख और प्रोफेसर गिरिधर आर. बाबू इस कदम के सख्त खिलाफ हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से बातचीत में कहा, ‘भारत में हर तीन बच्चों में से एक कुपोषित है, ऐसे में महामारी का शारीरिक व मानसिक तनाव और पड़े तो क्या होगा. यह बताता है भारतीय बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता बहुत अच्छी नहीं है. सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल से इसके प्रसार का जोखिम भी और बढ़ जाएगा.’

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों के मामले में 69 फीसदी मौतों का कारण कुपोषण होता है.

दिल्ली के सर्वे पर बात करते हुए बाबू ने कहा, ‘यह केवल यही दर्शाता है कि दिल्ली में सख्त लॉकडाउन लागू नहीं किया गया था. इसमें पता चला है कि अधिकांश बच्चों में कोई लक्षण नहीं थे और जिनमें थे भी वह बहुत मामूली थे. हमारे पास बच्चों में सीरोप्रिवेलेंस का प्रतीकात्मक अनुमान मौजूद नहीं है जिससे पता चल सके कि उनके लिए क्या-क्या चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं. मैं बच्चों में मल्टीसिस्टम इंफ्लेमेटरी बीमारी को लेकर चिंतित हूं, जो बच्चों के एक बार ठीक होने के बाद दूसरे गंभीर लक्षणों के साथ सामने आ सकती है. बच्चों को किसी अनजाने जोखिम में डालने के बजाए ज्यादा सतर्कता बरतने के पक्ष रहना चाहूंगा.


अभिभावकों और शिक्षकों की राय

एक सामुदायिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकलसर्किल्स का एक सर्वेक्षण बताता है कि केवल 33 प्रतिशत माता-पिता स्कूलों के खुलने के पक्ष में हैं.

गुजरात के धांगेन्द्र में रहने वाली 48 वर्षीय गृहिणी सुनीता अग्रवाल अपनी बेटी को स्कूल भेजने को लेकर काफी हिचकिचा रही हैं. उन्होंने दिप्रिंट से बातचीत में कहा, ‘जो कुछ भी सीखने की जरूरत है वह ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से सीख रही है. यद्यपि मैं कक्षा 12 की परीक्षा के महत्व को बखूबी समझती हूं लेकिन ये मेरी बेटी की जान से बढ़कर नहीं है.’

दिल्ली निवासी 38 वर्षीय आरती देवी, जिनके तीन बच्चे स्कूल जाने वाले हैं, ने भी कहा कि वह चाहेंगी कि उनके बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई करें. एक ऐसी अभिभावक जिनकी बच्ची इस बार 12वीं कक्षा में पहुंची है, ने कहा, ‘हम जिस क्षेत्र (मुनिरका गांव) में रहते हैं वहां हाल में कोविड मामलों में वृद्धि दिखी है. हम अपने बच्चों को स्कूल भेजकर जोखिम में नहीं डालना चाहते.’

उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता इतने सारे बच्चों के बीच शिक्षक सभी छात्रों पर कड़ी नजर रख पाएंगे. बच्चे होने के नाते वे आपस में घुले-मिलेंगे और लंच भी शेयर करेंगे.’

दिल्ली के एक निजी स्कूल में काम करने वाली एक टीचर भी इस विचार से असहज नजर आईं. उन्होंने कहा, ‘मुझे पता है कि मेरा स्कूल पूरी शिद्दत से नियमों का पालन करेगा लेकिन मैं अभी इससे बाहर ही रहना चाहूंगी. उन्होंने कहा कि मेट्रो और कैब से यात्रा करना शिक्षकों के लिए जोखिमभरा है जिससे उनके संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाएगा.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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