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327 women out of 700 lost their husbands in violence | हिंसा में 700 में से 327 महिलाओं ने पति खोए, अब यहां से आतंकी नहीं, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक निकल रहे


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श्रीनगर12 मिनट पहले

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​​​​​​​60 वर्षीय जाना बेगम ने 1993 में पति को खाे दिया था। उन्होंने अपने भाई की मदद से बेटे को पढ़ाया और अब उनका बेटा सरकारी नौकरी कर रहा है। - Dainik Bhaskar

​​​​​​​60 वर्षीय जाना बेगम ने 1993 में पति को खाे दिया था। उन्होंने अपने भाई की मदद से बेटे को पढ़ाया और अब उनका बेटा सरकारी नौकरी कर रहा है।

  • कश्मीर के उस गांव से बदलाव की रिपोर्ट, जिसने आतंक के दौर में सबसे ज्यादा पीड़ा झेली

कश्मीर में श्रीनगर से 120 किमी दूर घने जंगल और पहाड़ों के पास 700 परिवारों का गांव है दर्दपोरा। 1990 से 2003 के बीच जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था, तब एलओसी से पांच किमी नजदीक इस गांव ने अपने नाम के मुताबिक ही दर्द झेला। लेकिन, 2003 के बाद पिछले 17 साल से यहां शांति लौट आई है। अब गांव से आतंकी नहीं, डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षकों की पौध निकल रही है।

गांव के करीब आधे यानी 327 परिवारों की महिलाओं ने आतंकवाद के चलते अपने पति खोए हैं। हालांकि एक दशक में गांव के किसी बच्चे ने आतंक की राह नहीं पकड़ी। आज गांव के आसपास 5-6 स्कूल हैं। साक्षरता दर 70% से अधिक है।

यहां के युवा कश्मीर के बाहर भी बिजनेस कर रहे हैं। तीन युवा डॉक्टर बन चुके हैं। कुछ इंजीनियर, लेक्चरर हैं। स्कूल में शिक्षक शब्बीर अहमद कहते हैं, ‘गांव का हर बच्चा पढ़ रहा है। हम हिंसा के शिकार रहे हैं, लेकिन लोग नई शुरुआत करना चाहते हैं।

बच्चे उच्च शिक्षा के लिए विदेश में भी पढ़ रहे हैं।’ 30 साल के सुहैल अहमद के पिता की दो दशक पहले बंदूकधारियों ने हत्या कर दी थी। उनकी परवरिश मां और दादा ने की। अहमद इलाके के कॉलेज में लेक्चरर हैं। कहते हैं, ‘इस गांव ने हिंसा का घिनौना चेहरा देखा है।

हमने तमाम मुश्किलें देखीं। बावजूद मैंने पोस्ट ग्रैजुएशन किया। अब मुझे लेक्चरर की नौकरी मिल गई।’ अमन और तरक्की की राह पर लौटना गांव के लिए आसान नहीं था। 65 साल की शाहमल्ला बानो रोज ईंट और मिट्‌टी से बने कच्चे घर के बाहर बैठकर अपने बेटे का इंतजार करती रहती हैं।

सितंबर 2002 में उनके पति अब्दुल्ला बट काम से लौट रहे थे। घर से 50 मीटर पहले अज्ञात बंदूकधारियों ने उन्हें गोली मार दी। पांच बेटों और दो बेटियों की मां बानो कहती हैं, ‘पति की मौत के एक साल बाद 17 साल का बेटा मुश्ताक कमाने के लिए पंजाब गया था, लेकिन नहीं लौटा।’ यह कहानी अकेले बानो की नहीं है। जब आतंकवाद जोरों पर था, तब सेना का मुखबिर होने के शक में भी लोगों को गोलियों से भूना जाता रहा। यहां के करीब 600 बच्चे कश्मीर के विभिन्न अनाथालयों में रह रहे हैं।

माताएं संघर्ष कर बच्चों को पढ़ा रहीं, कई उच्च अध्ययन के लिए विदेश गए
60 वर्षीय जाना बेगम ने 1993 में पति को खाे दिया था। उस समय बड़ा बेटा 5वीं में पढ़ता था। सबसे छोटी बेटी 8 माह की थी। वे बताती हैं, भाई की मदद से बेटे को पढ़ाया। अब उसे सरकारी नौकरी मिल गई है।

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