‘कर्ज नीति’ बनी चीन की गले की हड्डी, कैसे अपने ही बुने जाल में फंस गया ‘ड्रैगन’

दुनिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए चीन (China) ‘कर्जनीति’ को अहम् हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है. वह छोटे देशों को विकास के नाम पर कर्ज देता है, उन्हें अपना कर्जदाता बनाता है और बाद में उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेता है.

बीजिंग: दुनिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए चीन (China) ‘कर्जनीति’ को अहम हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है. वह छोटे देशों को विकास के नाम पर कर्ज देता है, उन्हें अपना कर्जदाता बनाता है और बाद में उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लेता है. हालांकि, अपनी कर्जनीति के इस जाल में अब वह खुद फंसता दिखाई दे रहा है.

चीन ने दुनिया के 150 से ज्यादा देशों को कर्ज दिया है. इसमें पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव भी शामिल हैं. लेकिन अब उसे अपना पैसा वापस नहीं मिल रहा है और न ही संपत्ति कब्जाने के उसके मंसूबे सफल हो रहे हैं. पाकिस्तान लगातार कर्ज अदायगी में टालमटोल कर रहा है. एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान चाहता है कि कर्ज अदायगी के लिए 10 साल का समय और दिया जाए. बीजिंग भले ही इसके पक्ष में न हो, लेकिन उसे पाकिस्तान की यह बात माननी होगी, क्योंकि इस्लामाबाद से उसके कई रणनीतिक हित जुड़े हैं और आर्थिक नुकसान के लिए वह इनकी बलि नहीं दे सकता.

मजबूरी में लिया फैसला

समस्या केवल पाकिस्तान के मोर्चे पर ही नहीं है, कई अन्य देश भी फिलहाल कर्ज चुकाने में असमर्थता जता चुके हैं. इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर अपनी छवि चमकाने के लिए चीन ने 77 देशों से कर्ज अदायगी को अभी रोक दिया है, इनमें से 40 अकेले अफ्रीका में हैं. दरअसल, चीन इन देशों की आर्थिक स्थिति से अच्छे से वाकिफ है, वह जानता है कि उसे तुरंत अपना कर्ज वापस नहीं मिलेगा. इसलिए वह उन्हें मोहलत प्रदान कर रहा है, ताकि उसकी छवि प्रभावित न हो. एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन को दूसरे देशों से जो रकम वापस लेनी है, वो बढ़कर अब $5 ट्रिलियन से अधिक पहुंच गई है और आने वाले दिनों में इसमें इजाफे की संभावना है. लिहाजा यह कहना गलत नहीं होगा कि चीन खुद अपने जाल में फंसता जा रहा है.

योजनाएं हो रहीं प्रभावित

कोरोना संकट ने अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया है. ऐसे में चीन को अपना पैसा वापस मिलने की संभावना और भी कम हो गई है. धड़ाधड़ कर्ज बांटने और उसकी अदायगी नहीं होने के चलते बीजिंग को आर्थिक मोर्चे पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है. इससे उसकी कई महत्वकांक्षी परियोजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं.

कई रिपोर्ट्स में हुआ खुलासा  

अमेरिका, जर्मनी की कई शोध संस्थाओं ने चीन की इस कर्जनीति को लेकर बड़ा खुलासा किया है. जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के मुताबिक 2000 से लेकर 2018 के बीच देशों पर चीन का कर्ज 500 अरब डॉलर से बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर हो गई. आज के हिसाब से 5 ट्रिलियन डॉलर यानी 375 लाख करोड़ रुपए. वहीं, अमेरिका की हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिपोर्ट कहती है कि चीन और उसकी कंपनियों ने 150 से ज्यादा देशों को 1.5 ट्रिलियन डॉलर यानी 112 लाख 50 हजार करोड़ रुपए का कर्ज भी दिया है. इस समय चीन दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज देने वाला देश है. इतना कर्ज अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और वर्ल्ड बैंक ने भी नहीं दिया है. दोनों ने 200 अरब डॉलर यानी 15 लाख करोड़ रुपए का कर्ज दिया है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो दुनियाभर की जीडीपी का 6 प्रतिशत के बराबर कर्ज चीन ने दूसरे देशों को दिया है.

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