डिजिटल सेवाओं में सुधार का समय

डिजिटलीकरण के दौर में इंटरनेट संचार और सूचना प्राप्ति का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ज़रिया बन गया है। दशकों पूर्व इंटरनेट तक पहुँच को विलासिता का सूचक माना जाता था, परंतु वर्तमान में इंटरनेट सभी की ज़रूरत बन गया है। इसकी उपयोगिता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि COVID-19 जैसी वैश्विक महामारी के दौरान प्रभावित लोगों तक प्रशासनिक मदद व खाद्य सामग्री पहुँचाने का कार्य प्रभावी रूप से डिजिटल माध्यम के द्वारा किया जा रहा है।

एक सत्य यह भी है कि इस वैश्विक महामारी से विश्व के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं, विशेषज्ञों द्वारा कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं के नकारात्मक रूप से प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की गई थी। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण वर्तमान में दृष्टिगोचर हो रहा है, भारत की भी आर्थिक विकास दर में तीव्र गिरावट हुई है।

ऐसी विकट परिस्थिति में जब अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्र प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं तब डिजिटल सेवाओं का क्षेत्र ऐसा है जिसने सकारात्मक प्रदर्शन किया है। अब यह स्पष्ट है कि डिजिटल सेवाएँ 21 वीं सदी की अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण हो गई हैं। जब राष्ट्रीय या वैश्विक आपात स्थिति में वाणिज्य के अधिक पारंपरिक तरीके बाधित होते हैं, तब डिजिटल सेवाएँ, निर्मित हुए ऐसे अंतराल को भरने में सफल रही हैं। डिजिटल सेवाएँ स्वास्थ्य सेवाओं तथा खुदरा वितरण से लेकर वित्तीय सेवाओं तक कई क्षेत्रों में विविध प्रकार के उत्पादों की पहुँच और वितरण को सक्षम बनाती हैं।

डिजिटलीकरण में इंटरनेट का महत्त्व

  • इंटरनेट संचार हेतु एक अमूल्य उपकरण है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट की उपलब्धता ने वर्तमान युग में संचार को काफी आसान और सुविधाजनक बना दिया है।
  • इंटरनेट ने दूर-दराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले उन विद्यार्थियों के लिये भी बेहतर शिक्षा का विकल्प खोल दिया है, जिनके पास अब तक इस प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
  • इंटरनेट के माध्यम से सूचना के क्षेत्र में भी एक मज़बूत क्रांति देखी गई है। अब हम इंटरनेट के माध्यम से किसी भी प्रकार की सूचना को कुछ ही मिनटों में प्राप्त कर सकते हैं।
  • सूचना तक आसान पहुँच के कारण आम लोग अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक हुए हैं।
  • सभी सेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने से सरकार की लागत में कमी को भी सुनिश्चित किया जा सकता है।
  • यह राजनीति एवं लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी को बढ़ाने में भी मदद करता है।
  • सभी सेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने से सरकार की लागत में कमी को भी सुनिश्चित किया गया है। यह सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ाता है। साथ ही सरकारी योजनाओं के सफल कार्यान्वयन में सहायक हो सकता है।

अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया

  • भारत ने वर्ष 2024 तक पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा है। वैश्विक महामारी COVID-19 के कारण निश्चित रूप से इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कई बाधाएँ उत्पन्न हुई हैं। वस्तुतः इन बाधाओं को डिजिटल सेवाओं में वृद्धि कर दूर किया जा सकता है।
  • वैश्विक महामारी COVID-19 के दौरान भी डिजिटल सेवाओं में निवेश वैश्विक स्तर पर जारी है। वर्तमान में डिजिटल सेवाओं में प्राप्त होने वाला निवेश किसी अन्य क्षेत्र के सापेक्ष सर्वाधिक है।
  • भारत डिजिटल सेवा क्षेत्र में बढ़ रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign direct investment-FDI) के लिये एक आदर्श गंतव्य है और इसकी विशाल जनसंख्या इसे अभिनव घरेलू स्टार्ट-अप के लिये  निर्विवाद क्षमता प्रदान करती है।
  • विमुद्रीकरण के बाद से ही सरकार द्वारा डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी क्रम में देश में डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस जैसे मिशनों को तेज़ी से लागू किया जा रहा है, इन प्रयासों में COVID-19 महामारी एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगी क्योंकि आम जनमानस में संक्रमण से बचने के लिये डिजिटल सेवाओं के उपयोग हेतु जागरूकता में वृद्धि हो रही है।

डिजिटल भारत के समक्ष चुनौतियाँ 

  • विगत कुछ वर्षों में कई निजी और सरकारी सेवाओं को डिजिटल रूप प्रदान किया गया है और जिनमें से कुछ तो सिर्फ ऑनलाइन ही उपलब्ध हैं जिसके कारण उन लोगों को असमानता का सामना करना पड़ता है जो डिजिटली निरक्षर हैं।
  • किसी व्यक्ति के पास मोबाइल फोन का होना ‘डिजिटल’ होने का प्रमाण नहीं है। यहाँ तक ​​कि यदि कोई व्यक्ति स्मार्टफोन का उपयोगकर्त्ता है, तो भी वह स्वयं को ‘डिजिटल सेवी’ नहीं कह सकता है, जब तक कि उसके पास इंटरनेट कनेक्टिविटी न हो और वह इंटरनेट पर प्रासंगिक और समय पर जानकारी प्राप्त करना न जानता हो।
  • एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार, नीतियों में अस्पष्टता व ढाँचागत कठिनाइयों के चलते महत्त्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया परियोजना का सफल कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के मामले में अनेक चुनौतियाँ हैं। इसके अलावा बार-बार नेटवर्क कनेक्टिविटी टूट जाना या फिर सर्वर का ठप हो जाना भी कठिनाई पैदा करता है।
  • भारत में अधिकांश मोबाइल व इंटरनेट उपयोगकर्त्ता शहरी क्षेत्रों में निवास करते हैं, जबकि हम जानते हैं कि भारत की कुल आबादी का 67 प्रतिशत भाग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है।
  • डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के सामने सबसे बड़ी चुनौती ढाँचागत विकास में हो रही देरी है। एक अनुमान के अनुसार, भारत को बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिये 80 लाख से अधिक वाई-फाई हॉटस्पॉट की ज़रूरत होगी, जबकि इस समय इनकी उपलब्धता बहुत कम है।
  • टैक्सेशन व अन्य नियामकीय दिशा-निर्देशों से जुड़े कुछ मुद्दे भी डिजिटल इंडिया की राह में बाधा बन जाते हैं। कुछ सामान्य नीतिगत बाधाओं में से एक FDI नीति में स्पष्टता का अभाव भी है जिसने ई-कॉमर्स सेक्टर के विकास को प्रभावित किया है। नीतिगत ढाँचे में अस्पष्टता के कारण ही उबर और ओला जैसी परिवहन सेवा कंपनियों का बार-बार स्थानीय सरकारों से विवाद होता है।
  • भारत का मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी कानून साइबर अपराधों को रोकने के लिहाज़ से बहुत प्रभावी नहीं है। एटीएम कार्ड की क्लोनिंग के अलावा, बैंक अकाउंट का हैक हो जाना, आपका डेटा और गोपनीय जानकारी हैकर्स तक पहुँच जाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रहती हैं। ऐसे में जब तक साइबर अपराधों को लेकर कानून में कठोर प्रावधान नहीं होंगे, तब तक  डिजिटल इंडिया को वह रफ्तार नहीं मिल पाएगी, जो अपेक्षित है।
  • यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या इंटरनेट पर हमारी जानकारी और पहचान सुरक्षित है? देश के मौजूदा कानून के मुताबिक सभी सर्विस प्रोवाइडरों को अपने इंटरनेट और मोबाइल ग्राहकों की जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को देनी होती है। इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आईएसपी) स्वयं को केवल  इंटरनेट ग्राहक तक पहुँचाने का हाईवे मानते हैं। उनका कहना है कि इंटरनेट यूज़र के मेल या सोशल नेटवर्किंग साइट पर दी जानकारी केवल विदेशी कंपनियों के सर्वर में होती है और भारत में उसे डिक्रिप्ट नहीं किया जा सकता। एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन को बढ़ावा देकर भेजने वाले (Sender) और पाने वाले (Receiver) के बीच में डेटा को सुरक्षित बनाया जा सकता है।

डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने में सरकार के प्रयास 

भारतनेट कार्यक्रम

  • इस परियोजना का उद्देश्य राज्यों तथा निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी से ग्रामीण तथा दूर-दराज़ के क्षेत्रों में नागरिकों एवं संस्थानों को सुलभ ब्रॉडबैंड सेवाएँ उपलब्ध कराना है।
  • भारतनेट परियोजना के तहत 2.5 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर के ज़रिये हाईस्पीड ब्रॉडबैंड, किफायती दरों पर उपलब्ध कराया जाना है। इसके तहत ब्रॉडबैंड की गति 2 से 20 Mbps तक निर्धारित करने का लक्ष्य रखा गया।
  • इसके तहत स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों एवं कौशल विकास केंद्रों में इंटरनेट कनेक्शन नि:शुल्क प्रदान किया गया
  • इस परियोजना का वित्तपोषण ‘यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड’ (Universal Service Obligation Fund-USOF) द्वारा किया गया था।

राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन

  • राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन की शुरुआत वर्ष 2020 तक भारत के प्रत्येक घर में कम-से-कम एक व्यक्ति को डिजिटल साक्षर बनाने के उद्देश्य से की गई है।
  • इस परियोजना का उद्देश्य तकनीकी दृष्टि से निरक्षर वयस्कों की मदद करना है ताकि वे तेज़ी से डिजिटल होती दुनिया में अपना स्थान खोज सकें।

राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति-2018

  • प्रत्येक नागरिक को 50 Mbps की गति से सार्वभौमिक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी प्रदान करना।
  • सभी ग्राम पंचायतों को वर्ष 2020 तक 1 Gbps तथा वर्ष 2022 तक 10  Gbps की कनेक्टिविटी प्रदान करना।
  • राष्ट्रीय फाइबर प्राधिकरण बनाकर राष्ट्रीय डिजिटल ग्रिड की स्थापना करना।
  • ऐसे क्षेत्र जिन्हें अभी तक कवर नहीं किया गया है, के लिये कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना।
  • डिजिटल संचार क्षेत्र के लिये 100 बिलियन डॉलर का निवेश आकर्षित करना।

डिजिटल नवाचार का केंद्र बन रहा भारत

  • डिजिटल इंडिया देश में डिजिटल तरीके से सेवाएँ उपलब्ध कराने के लिये आवश्यक डिजिटल आधारभूत ढाँचा खड़ा करते हुए डिजिटल सशक्तीकरण का माध्यम बन रहा है। एक ऐसे विश्व में जहां अब भौगोलिक दूरियाँ बेहतर भविष्य के निर्माण में कोई बाधा नहीं रह गई हैं, भारत हर क्षेत्र में डिजिटल नवाचार का सशक्त केंद्र बन चुका है।
  • ऑप्टिकल फाइबर से जुड़े एक लाख से अधिक गाँव, 121 करोड़ मोबाइल फोन, 100 करोड़ आधार और 50 करोड़ इंटरनेट सेवा का उपयोग करने वाले लोगों के साथ भारत अब दुनिया में प्रौद्योगिकी के साथ सहजता से जुड़ी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है।

अपेक्षित सुधार 

  • वर्तमान में डिजिटल क्षेत्र में विचाराधीन तीन लंबित सुधारों को अपनाने का सही समय है, जिससे  आने वाले वर्षों के लिये डिजिटल सेवाओं में भारत के विकास प्रक्षेपवक्र को प्रभावित करने की संभावना है। यह तीन सुधार इस प्रकार हैं-

व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक

  • भारत सरकार ने भी व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 (Personal Data Protection Bill, 2019) को शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया था।
  • विधेयक को व्यापक विचार-विमर्श के लिये संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया है जहाँ विधेयक में शामिल बिंदुओं पर व्यापक चर्चा की जाएगी।
  • व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून एक व्यापक कानून है जो व्यक्तियों को इस बात पर अधिक नियंत्रण देने का प्रयास करता है कि उनका व्यक्तिगत डेटा कैसे एकत्रित, संग्रहीत और उपयोग किया जाता है।
  • एक बार पारित होने के बाद यह कानून वर्तमान भारतीय गोपनीयता कानून में भारी सुधार का वादा करता है जो कि अपर्याप्त और अनुचित रूप से लागू किया गया है।

ई-कॉमर्स नीति

  • ई-कॉमर्स के क्षेत्र में उपभोक्ता संरक्षण, डेटा गोपनीयता और हितधारकों हेतु समान अवसर उपलब्ध कराने जैसी समस्याएँ पटल पर आती रही हैं। इन्हीं समस्याओं हेतु उचित समाधान प्रस्तुत करने के लक्ष्य के साथ राष्ट्रीय ई-कॉमर्स नीति एक रणनीति तैयार करती है।
  • यह नीति घरेलू निर्माताओं और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के हितों को भी ध्यान में रखती है, साथ ही ऑनलाइन बाज़ार को उनके लिये बराबरी का क्षेत्र बनाना चाहती है।

सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम

  • सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) अधिनियम के प्रस्तावित संशोधनों जो व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लेटफार्मों पर ‘गैरकानूनी’ जानकारी उपलब्ध कराने वाले ‘प्रवर्तक’ का पता लगाने और ऐसी सूचनाएँ अधिसूचित होने के 24 घंटे बाद इस तरह की सामग्री को हटाना अनिवार्य करते हैं, का मसौदा जारी किया है।

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