चीन के मंसूबो का जवाब देने को तैयार भारत

साल 2020 में विश्व पटल पर अभी तक जो परिस्थितियाँ बन रही हैं वो किसी बहुत बड़े संकट की ओर इशारा कर रही हैं ।

कोरोना महामारी से विश्व अर्थव्यवस्था वैसे भी अंधकार युग में प्रवेश कर चुकी हैं । समस्या कितनी बड़ी हैं वो आम जनता को अभी तक पूरी तरह समझ में भी नहीं आ रही । नेता और विशेषज्ञ अपने अपने तरीक़े से समस्या का समाधान खोजने में लगे हैं लेकिन कोई भी जनता के सामने वस्तुस्थिति की गम्भीरता को सीधे तौर पे नहीं रख रहा ।

इसी बीच चीन अमेरिका में तल्ख़ी बढ़ती जा रही और भारत चीन सीमा पे तनाव भी चरम पे हैं। हो सकता है कि सरकारें जनता का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटाने के लिए युद्ध की ओर अग्रसर हों ।

चीन में जनता का असंतोष बढ़ता जा रहा, हॉंगकॉंग में आजादी की माँग सर उठा रही, वही दक्षिणी चीन सागर का विवाद भी गहराता जा रहा, और इन सब के बीच कोरोना की समस्या ने आग में घी डालने का काम किया है ।
अमेरिका में भी अगले वर्ष चुनाव हैं और वहाँ की अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे बुरे दौर से गुज़र रही । ट्रम्प प्रशासन अपनी नाकामियों का ठीकरा भी चीन के सर फोड़ने को बेताब है ।

इनसब के बीच भारत के सामने दोहरी चुनौती है, एक तरफ़ कोरोना से जंग जारी हैं लेकिन सरकार दिशाहीन दिखायी पड़ रही वहीं दूसरी ओर चीन सीमा पे आँखे दिखा रहा और भारत का रक्षा तंत्र अभी भी इतना मज़बूत नहीं हैं कि ऐसे समय में चीन के साथ लम्बे समय तक युद्ध झेल सके ।

1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध की औपचारिक शुरूवात तो 3 दिसम्बर 1971 को हुई थी लेकिन युद्ध के बादल तो मार्च महीने से ही दिखायी देने लगे थे । इसी प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध के एक साल पहले से ही ऐसी परिस्थितियाँ बननी शुरू हो गई थीं जिससे कि युद्ध होना अवश्यम्भावी हो गया था। अभी देश और विश्व की जो वर्तमान स्थिति है वो कही न कही भविष्य के गम्भीर ख़तरे की आहट दे रहीं ।

भारत में ऊपर ऊपर से देखने में बस कोरोना ही सबसे बड़ी समस्या के तौर पे नज़र आ रहा लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि कोरोना के रोकथाम के लिए जो लॉकडाउन था वो पूरी तरह से सफल नहीं कहा जा सकता और अब मामले तेज़ी से बढ़ते जा रहे और दूसरी तरफ़ उद्योग-व्यापार, नौकरी की हालत दिन-प्रतिदिन ख़स्ता होती जा रही ।
अगर ऐसे समय में चीन के साथ युद्ध के हालात बनते हैं तो स्थिति की भयावयता की कल्पना भी नहीं की जा सकती । चीन का दुस्साहस दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा । सीमा से जो खबरें छन छन के बाहर आ रही वो किसी बड़ी विपत्ति की ओर इशारा कर रही । जिस समय कोरोना ने सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था को झकझोर के रख दिया हैं, उसी वक़्त चीन का ये कदम एक सोचो समझी साजिश लगता है ।
चीन को पता है कि ज़्यादातर बड़े देश कोरोना की वजह से खुद की आंतरिक समस्याओं में उलझे हुए हैं, ऐसे समय भारत चीन सीमा विवाद पर दुनियाँ का उतना ध्यान नहीं जाएगा जितना कि सामान्य परिस्थितियों में जाता ।
कभी नेपाल को उकसा के तो कभी बांग्लादेश को मोहरा बना के चीन भारत को चौतरफ़ा घेरने की फ़िराक़ में हैं । पाकिस्तान तो उसका पिट्ठू अपने जन्म से ही है तो वो तो वही करेगा जो उसका आका चीन उससे करने को बोलेगा ।

भारत को चाहिए कि सबसे पहले वो चीन के अर्थतंत्र पे गम्भीर चोट पहुँचाये । इसके लिए उसको अमेरिका की मदद लेनी पड़ेगी । चीन का सबसे ज़्यादा व्यापार भी अमेरिका के साथ ही है और भारत के साथ व्यापार में भी चीन मज़बूत स्थिति में है । एक तरफ़ चीन के प्रोडक्ट्स का बहिष्कार होना चाहिए और ये सरकार के साथ साथ जनता के लेवल पे ही सम्भव है क्योंकि देश किसी एक से नहीं चलता, सबको मिल के प्रयास करना होगा । दूसरा जिस जिस क्षेत्र में चीन को महारत हासिल है उसमें विकसित राष्ट्रों के साथ मिल के रिसर्च एंड डेविलपमेंट में और अधिक फ़ोकस कर चीन से बेहतर और सस्ता प्रोडक्ट उत्पादित किया जाए ।
अमेरिका या युरोपीय देशों को अपनी उद्योग भारत में लगाने के लिए ज़्यादा सुविधा दी जाए ताकि वो चीन से निकल कर भारत का रुख़ करें । हालाँकि मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट में ऐसी ही बात कही गई है लेकिन इसको सरकारी लाल फ़ीताशाही से दूर रखना बड़ी चुनौती होगी ।
इन सब के अलावा चीन की कई कमजोर नसें हैं जैसे कि ताइवान, तिब्बत, शिनजियांग प्रान्त, होंगकोंग, इत्यादि ।
भारत को चाहिए विदेशी ताक़तों के साथ मिल के शिनजियांग और होंगकोंग जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पे डिस्टरबेंस क्रीएट करें जिससे कि चीन गलत कदम उठाने पे मजबूर हो जाए और उसे अंतराष्ट्रीय स्तर पर फिर घेरा जा सकें मानवाधिकार की आड़ ले के वही दूसरी तरफ़ ताइवान, जापान, वियतनाम जैसे चीन विरोधी देशों से सैनिक संधि कर के उसको चौतरफ़ा घेरा जा सकता है ।
दक्षिणी चीन सागर में अमेरिका व जापान के साथ मिल के एक संयुक्त नेवल फ्लीट तैयार करनी चाहिए जो कि चीन के दक्षिणी चीन सागर में वर्चस्व के सपने को कभी हक़ीक़त में तब्दील न होने दे ।
इसके अलावा पाकिस्तान के साथ मिल के चीन ने एक व्यापारिक रूट बनाया है जो की तिब्बत से होते हुए ग़ुलाम कश्मीर रास्ते पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जाता है ।
इस रूट पर जितना हो सके समस्या पैदा करने से चीन और पाकिस्तान दोनो की कमर टूटेगी, क्योंकि यहाँ चीन के हज़ारों करोड़ रुपए लगे हुए हैं ।

तिब्बत भी चीन की दुखती रग है, भारत को इसपर भी ध्यान देने की जरुरत है कि जिस प्रकार चीन हमें कई मोर्चो पे घेरने की कोशिश करता रहता है उसी प्रकार हम तिब्बत को कैसे उसके खिलाफ मोहरा बना सकते हैं । रूस एक समय भारत का अभिन्न मित्र था परन्तु अब उसका झुकाव चीन की तरफ बढ़ता जा रहा, इस विषय पर भी ध्यान देने की जरुरत है कि कैसे रूस को फिर से अपने पालें में लाया जा सके ।

अगर भारत इस प्रकार से चीन को चौतरफ़ा घेरने में सफल हो जाता है तो वो दिन दूर नहीं जब चीन की अक़्ल ठिकाने आ जाएगी और वो भारत से दुबारा उलझने के पहले सौ बार सोचेगा ।

देश की जनता को हर विषम परिस्थितियों के लिए खुद को तैयार करना होगा और अपने शीर्ष नेतृत्व पर भरोसा क़ायम रखना होगा । आशा हैं कि भारत इस चुनौती से भी जल्द ही बाहर निकल आएगा लेकिन तब तक काफ़ी सजगता बरतनी पड़ेगी ।

ईशान चतुर्वेदी

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