संपादकीय: पाकिस्तान के तेवर !

चीन से अपनी नजदीकी जाहिर करने के लिए उसने उस अमेरिका के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है, जिसकी इमदाद पर पहले उसके खर्चे चला करते थे। मगर इस तरह अमेरिका या चीन की कठपुतली बन कर पाकिस्तान कभी तरक्की नहीं कर सकता। फिर इमरान खान के ताजा बयान से आतंकवाद के मसले पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उसे चीन कब तक बचा पाएगा, कहना मुश्किल है।

आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान का वास्तव में क्या रुख है, इसका खुलासा वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान के ताजा बयान से हुआ। इमरान खान ने संसद में कहा कि आतंकवाद की लड़ाई में अमेरिका का साथ देना पाकिस्तान की बहुत बड़ी गलती थी। उन्होंने अलकायदा सरगना और खूंखार आतंकवादी उसामा-बिन लादेन को शहीद तक कह दिया। उन्होंने अपने पूरे भाषण में अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को प्रश्नांकित किया, सो यह बयान उनकी सोची-समझी रणनीति का ही हिस्सा था।

इसके पहले वे तालिबानियों को भाई कह चुके हैं। उनका ताजा बयान ऐसे समय में आया है, जब पाकिस्तान पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग न करने, अपने यहां आतंकी संगठनों को पनाह देने को लेकर चौतरफा निंदा हो रही है। उस पर कई देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। यों जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लश्करे-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों के प्रति नरमी बरतने को लेकर सवाल उठे हैं, पाकिस्तान हमेशा साबित करने का प्रयास करता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में वह साथ है। दिखावे के लिए उसने कुछ समय तक इन संगठनों के खिलाफ सख्ती भी बरती है। पर अब उसके तेवर बदले हुए हैं, तो उसकी कुछ वजहें साफ हैं।

अमेरिका ने पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य सहयोग पर रोक लगा रखी है। आतंकी संगठनों को पनाह देने को लेकर कई बार उसे चेतावनी भी दे चुका है। पिछले बुधवार को वित्तीय कार्यबल यानी एफएटीएफ ने कहा कि पाकिस्तान अभी तक आतंकी संगठनों के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं कर पाया है, इसलिए उसे फिलहाल ग्रे सूची में ही रखा जाना चाहिए। अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक कर चुकी है। इस तरह अमेरिका से पाकिस्तान को मिलने वाली इमदाद रुक गई है। छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस कदर खराब है कि वह बिना किसी ताकतवर देश की मदद के अपने जरूरी खर्चे नहीं उठा सकता।

इस तरह अमेरिका की उससे नाराजगी भारी पड़ रही है। इसका लाभ उठाते हुए चीन ने उसे मदद पहुंचानी शुरू कर दी है। उसने वहां भारी निवेश किया है। यहां तक कि जब भी संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान को आतंकवाद को पनाह देने वाला राष्ट्र साबित करने की कोशिश हुई है, चीन हमेशा पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा हुआ है। फिर चीन और अमेरिका के रिश्तों में इन दिनों जैसी तल्खी है, उसमें पाकिस्तान का अमेरिका को लेकर चुप रहना चीन को नागवार गुजरेगा। इसके अलावा इस वक्त अमेरिका का रुख भारत के प्रति अधिक दोस्ताना है, इसलिए भी वह पाकिस्तान की आंखों की किरकिरी बना हुआ है।

इन दिनों भारत और चीन के बीच भी रिश्ते खटास भरे हैं। नियंत्रण रेखा पर तनाव के समय नेपाल तक चीन के साथ खड़ा होकर भारत के खिलाफ अपना रुख जाहिर कर चुका है। ऐसे में पाकिस्तान कैसे अपनी वफादारी जाहिर नहीं करता! पाकिस्तान की मजबूरी है कि उसे चीन और अमेरिका में से किसी न किसी के साथ खड़ा होना ही पड़ेगा।

सो, चीन से अपनी नजदीकी जाहिर करने के लिए उसने उस अमेरिका के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है, जिसकी इमदाद पर पहले उसके खर्चे चला करते थे। मगर इस तरह अमेरिका या चीन की कठपुतली बन कर पाकिस्तान कभी तरक्की नहीं कर सकता। फिर इमरान खान के ताजा बयान से आतंकवाद के मसले पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उसे चीन कब तक बचा पाएगा, कहना मुश्किल है।

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