कोरोना से मर रहे लोगों को अंतिम विदाई देने वाला मुसलमान

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दुनियाभर में लोग कोरोना वायरस की महामारी से लड़ रहे हैं| फ्रंटलाइन पर डॉक्टर, नर्स, मेडिकल स्टाफ़ और पुलिसकर्मी हैं जो अपनी ड्यूटी कर रहे हैं| शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता भी लोगों को जागरुक कर रहे हैं|

इस मुश्किल वक़्त में सूरत का एक मुसलमान व्यक्ति बहुत से परिवारों का सहारा बन गया है| इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सूरत में कोरोना वायरस से चार लोगों की मौत हुई थी और उनका अंतिम संस्कार किया अब्दुल मालाबरी ने|

कोरोना वायरस से मर रहे सभी जाति-धर्म के लोगों का अंतिम संस्कार अब्दुल ही करवा रहे हैं| संक्रमण के डर की वजह से परिजन लाशों के पास तक नहीं आ रहे हैं| ऐसे में अब्दुल भाई लोगों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं|

तीस साल से सेवा कर रहे हैं अब्दुल

बीबीसी गुजराती सेवा से बात करते हुए 51 साल के अब्दुल ने कहा, “मैं तीस सालों से लावारिस या छोड़ दिए गए शवों का अंतिम संस्कार कर रहा हूं| सड़कों पर रह रहे लोग, भिखारी, या फिर आत्महत्या करने वाले लोग, जिन्हें अंतिम विदाई देने वाला कोई नहीं होता|”

अब्दुल बताते हैं कि उनके साथ पैंतीस स्वयंसेवक काम करते हैं और उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी लोगों के अंतिम संस्कार किए हैं|

“जब कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़ने लगे तो सूरत नगर निगम ने हमसे संपर्क किया| उन्होंने हमें बताया कि दुनियाभर में हज़ारों लोगों की मौत हो चुकी है| ऐसी मौतें सूरत में भी हो सकती हैं, ऐेसे लोगों के शव परिजनों को नहीं सौंपे जा सकते हैं|”

“उन्होंने हमसे कहा कि क्या हम ऐेसे लोगों का अंतिम संस्कार कर सकते हैं और हम तुरंत राज़ी हो गए|”

“हमने अलग अलग समय पर सेवा देने के लिए अपने बीस लोगों के नाम अधिकारियों को दिए| हमारे पास सभी ज़िला अधिकारियों और अस्पतालों के भी नंबर हैं और वो हमें कभी भी संपर्क कर सकते हैं| जैसे ही हमें कॉल आता है, हम अपनी किट के साथ निकल पड़ सकते हैं| डिप्टी कमिश्नर आशीष नाइक ने हमें बताया कि शवों का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए, पीपीई किट का इस्तेमाल किया जाए, अपने आप को कैसे बचाया जाए|”

अपने आप को कैसे बचाते हैं वो?

कोरोना वायरस से मरने वालों का अंतिम संस्कार करते हुए संक्रमण का ख़तरा रहता है|

अब्दुल बताते हैं, “हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों का पालन करते हैं और बॉडी सूट, मास्क और दास्ताने पहनते हैं|”

“शव पर रसायन छिड़का जाता है और फिर उसे पूरी तरह ढक दिया जाता है| हमारे पास शव ले जाने के लिए पांच वाहन हैं| इनमें से दो को हम सिर्फ़ कोरोना पीड़ितों के लिए ही आरक्षित रखते हैं| इन वाहनों को हम नियमित तौर पर सेनेटाइज़ करते हैं|”

वो कहते हैं, “हमारी संस्था एकता ट्रस्ट इस काम को तीन दशकों से कर रही है| सूरत और आसपास के ज़िलों में रोज़ाना दस-बारह शव मिलते हैं| नदियों, नहरों या रेलवे ट्रेक से शव मिलते हैं| हम ऐसे शवों का रोज़ाना अंतिम संस्कार करते हैं और इस दौरान मास्क और दास्ताने भी पहनते हैं|”

“हमें इस काम में सरकार का भी सहयोग मिलता है| पुलिस, अग्निशमन और नगर निगम की टीमें भी हमारा सहयोग करती हैं|”

ये डराने से ज़्यादा दर्दनाक है

मारे गए लोगों के परिजनों से जुड़े अपने अनुभव के बारे में बताते हुए अब्दुल कहते हैं, “जब कोई व्यक्ति कोरोना संक्रमित हो जाता है तो उनके परिवार को भी क्वारंटीन में रखा जाता है| उन्हें क्वारंटीन केंद्र भेज दिया जाता है|”

“उन्हें वहां चौदह दिनों तक रखा जाता है और उनके टेस्ट भी किए जाते हैं| अगर इलाज के दौरान कोरोना संक्रमित की मौत हो जाती है तो उनके परिजन अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाते हैं| हमने सालों से क्षत-विक्षत शव देखे हैं, कोरोना हमारे लिए डरावना नहीं है लेकिन परिजनों को अपनों को अंतिम विदाई भी ने दे पाने को देखना दर्दनाक होता है|”

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