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Haryana Athlete Sumit Antil wins Gold and Yogesh Kathunia wins Silver Medal in Tokyo Para Olympic, CM Manohar Lal Announced Cash Reward | पैरा ओलिंपिक में सोनीपत के आंतिल ने 3 बार वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ जीता GOLD, बहादुरगढ़ के कथूनिया ने जीता SILVER


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सोनीपत/बहादुरगढ़2 घंटे पहले

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हरियाणा सरकार ने पैरा ओलिंपिक में देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को इनाम का ऐलान किया है। सोनीपत जिले के गांव खेवड़ा के सुमित आंतिल ने टोक्यो पैरा ओलिंपिक में जेवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक और बहादुरगढ़ की राधा कॉलोनी के योगेश कथूनिया ने डिस्कस थ्रो में सिल्वर मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया है। प्रदेश सरकार ने योजना के तहत सुमित को 6 करोड़ और योगेश को 4 करोड़ रुपए के साथ दोनों को सरकारी नौकरी और अन्य सुविधाएं देने की घोषणा की है। खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने ट्वीट करके यह जानकारी दी।

पांचवां प्रयास सबसे बेहतर रहा सुमित का
सुमित आंतिल ने टोक्यो पैरा ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने के साथ-साथ तीन वर्ल्ड रिकॉर्ड भी तोड़े हैं। सुमित की जीत पर उसके गांव खेवड़ा में जश्न का माहौल है। सड़क हादसे में अपना एक पैर गंवाने वाले सुमित सोमवार को फाइनल में बेहतरीन फॉर्म में थे। F-64 क्लास में एक के बाद एक उन्होंने तीन वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़े। पहले उन्होंने 66.95 मीटर दूर भाला फेंककर विश्व कीर्तिमान बनाया। फिर दूसरी कोशिश में 68.08 मीटर के स्कोर से अपना ही वर्ल्ड रिकॉर्ड सुधारा। 5वीं कोशिश इससे भी बेहतर थी और 68.55 मीटर के स्कोर के नया वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड मेडल जीता।

योगेश ने पहले प्रयास विफल रहने के बाद वापसी की
डिस्कस थ्रो के F-56 वर्ग में हर एथलीट को कुल 6 थ्रो मिले। योगेश का पहला प्रयास विफल रहा, इसके बाद उन्होंने दूसरे प्रयास में 42.84 मीटर चक्का फेंका। दो राउंड के बाद योगेश दूसरे स्थान पर बने हुए थे। हालांकि तीसरे और चौथे राउंड में योगेश कोई भी स्कोर करने में विफल रहे और तीसरे स्थान पर खिसक गए। पांचवें राउंड में उन्होंने 43.55 मीटर दूर चक्का फेंक सिल्वर मेडल पोजीशन पर वापसी की। अंतिम राउंड में योगेश ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन करते हुए 44.38 मीटर की दूरी तक चक्का फेंका और सिल्वर मेडल अपने नाम कर लिया।

चुनौती भरा रहा सुमित का सफर, हादसे में गंवाया था पांव
7 जून 1998 को जन्मे सुमित आंतिल का पैरालिंपिक तक का सफर चुनौतियों से भरा रहा है। सुमित परिवार में सबसे छोटा और इकलौता बेटा है। परिवार में मां के अलावा बड़ी तीन बहनें रेनू, सुशीला और किरण हैं। सुमित उस समय 7 साल का था, जब एयरफोर्स में तैनात उनके पिता रामकुमार की बीमारी के चलते मौत हो गई। उनकी मां निर्मला ने मुश्किल हालातों से जूझते हुए चारों बच्चों का पालन-पोषण किया। 12वीं कक्षा में कॉमर्स की ट्यूशन से लौटते समय 5 जनवरी 2015 को एक ट्रैक्टर-ट्रॉली ने सुमित की बाइक को टक्कर मार दी। हादसे में सुमित ने अपना एक पैर गंवा दिया। सुमित ने कई माह अस्पताल में गुजारे। 2016 में पुणे में उन्हें नकली पैर लगाया गया। मां निर्मला देवी का कहना है हादसे के बावजूद सुमित के चहरे पर मायूसी कभी नहीं आई और न ही उसका हौसला टूटा। धीरे-धीरे सुमित ने खेलों में रूचि लेना शुरू कर दिया। बेटे के साथ हुए हादसे के बाद जब भी उसकी आंखों में आंसू आए तो सुमित पोंछते हुए वादा करता कि एक दिन उनका नाम रोशन करेगा। एशियन रजत पदक विजेता कोच वीरेंद्र धनखड़ ने मार्गदर्शन किया और सुमित को साई सेंटर से दिल्ली लेकर पहुंचे। दिल्ली में द्रोणाचार्य अवॉर्डी कोच नवल सिंह से मिलवाया और वहीं उसने जैवलिन थ्रो के गुर सीखे। सुमित ने कड़ी मेहनत कर अपना वादा पूरा किया और गोल्ड जीत परिवार के साथ देश का नाम भी रोशन किया।

योगेश का संघर्ष भी कम नहीं, 2006 में हुआ था पैरालिसिस
टोक्यो पैरालिंपिक में सिल्वर मेडल जीतने वाले योगेश कथूनिया के बहादुरगढ़ की राधा कॉलोनी में उनके घर पर खुशी का माहौल है। टोक्यो रवाना होने से पहले योगेश ने अपने पिता रिटायर्ड कैप्टन ज्ञानचंद और मां मीना देवी से मेडल लेकर आने का वादा किया था और उन्होंने अपना वादा पूरा किया। योगेश को साल 2006 में पैरालिसिस हो गया था। योगेश की दो बड़ी बहनें हैं। जिस समय उन्हें पैरालिसिस हुआ, उस वक्त उनकी उम्र मात्र 9 साल थी। 2017 में कॉलेज में एंट्री के साथ दोस्तों ने उसका हौसला बढ़ाया और पैरा स्पोर्ट्स के संबंध में जागरूक किया। इसके बाद योगेश खेलों में हिस्सा लेने लगे और डिस्कस थ्रो को अपनी लाइफ का हिस्सा बनाकर एक बाद एक के बाद कई मुकाम हासिल किए। योगेश के दादा हुकम चंद सेना में सूबेदार रहे हैं। योगेश पिछले डेढ़ साल से प्रैक्टिस के कारण घर नहीं आया है। अब जब वह घर लौटेगा तो उसका जोरदार स्वागत किया जाएगा।

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