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India’s longest sea bridge started, this 5.6 km long bridge reduced the journey of 1 hour to 10 minutes | भारत के सबसे लंबे समुद्री ब्रिज की शुरुआत, 5.6 किलोमीटर लंबे इस ब्रिज ने 1 घंटे के सफर को 10 मिनट का कर दिया


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15 मिनट पहले

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मुंबई का बांद्रा-वर्ली सी लिंक। वो ब्रिज जिसने बांद्रा से वर्ली जाने वालों के सफर को एक घंटे से कम कर 10 मिनट का कर दिया। आज ही के दिन 2009 में इस ब्रिज को आम लोगों के लिए शुरू किया गया था। ये भारत का पहला 8 लेन और सबसे लंबा समुद्रीय ब्रिज है। इसकी लंबाई 5.6 किलोमीटर है।

इस ब्रिज के बनने से पहले बांद्रा से वर्ली जाने के लिए माहिम कॉजवे का इस्तेमाल करना पड़ता था। ये रास्ता लंबा तो था ही, मुंबई में वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ ही इस रास्ते पर रोजाना जाम लगने लगा। इसके बाद बांद्रा को वर्ली से जोड़ने के लिए एक वैकल्पिक रास्ते की मांग उठने लगी।

आखिरकार फैसला लिया गया कि मुंबई के पश्चिमी तटीय इलाकों से होता हुआ फ्री वे बनाया जाएगा। ये फ्री वे मरीन ड्राइव को कांदिवली से जोड़ेगा।

इसी प्रोजेक्ट के तहत सबसे पहले बांद्रा वर्ली सी लिंक का काम शुरू किया गया। 1999 में इस ब्रिज को बनाने का काम शुरू हुआ। तब इसकी अनुमानित लागत 600 करोड़ रुपए आंकी गई थी और 5 साल में ब्रिज का काम पूरा करने का टारगेट रखा गया था।

रात में लाइटिंग की वजह से ब्रिज और भी खूबसूरत नजर आता है। ब्रिज की लाइटिंग पर ही 9 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।

रात में लाइटिंग की वजह से ब्रिज और भी खूबसूरत नजर आता है। ब्रिज की लाइटिंग पर ही 9 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।

ब्रिज बनने की शुरुआत से ही सरकार को खासी परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। पुल के निर्माण के खिलाफ कोर्ट में पर्यावरण कार्यकर्ताओं और मछुआरों ने कई जनहित याचिकाएं दायर कीं। इन पर सुनवाई लंबी चली। इस वजह से ब्रिज का काम पूरा होने में देरी भी हुई और इसकी लागत भी बढ़ गई।

आखिरकार साल 2009 में अपने तय वक्त से 5 साल बाद ब्रिज का काम पूरा हो पाया। खर्च भी 600 करोड़ से बढ़कर 1600 करोड़ हुआ। 30 जून 2009 को पुल की 8 में से 4 लेन को आम ट्रैफिक के लिए खोला गया। 2010 में सभी 8 लेन शुरू की गईं और इसे राजीव गांधी सी लिंक नाम दिया गया।

इस पुल पर केवल बड़े वाहनों को ही आने-जाने की अनुमति है। दोपहिया वाहन और पैदल राहगीर इस पुल से नहीं जा सकते। कहा जाता है कि इस ब्रिज में धरती की परिधि के बराबर स्टील के तारों का इस्तेमाल हुआ है।

1937: दुनिया के पहले इमरजेंसी नंबर की शुरुआत

10 नवंबर 1935। लंदन के विम्पल स्ट्रीट के एक घर में आग लग गई। इस घर के पड़ोस में रहने वाले शख्स ने फायर ब्रिगेड को फोन किया, लेकिन किसी वजह से फोन लगा नहीं और आग बुझाने फायर ब्रिगेड नहीं पहुंच सकी। इस हादसे में 5 महिलाओं की जलकर मौत हो गई।

हादसे के बाद इस शख्स ने ‘द टाइम्स’ अखबार में लेख लिखा और इस हादसे की न्यायिक जांच की मांग की। शख्स ने इस हादसे के पीछे सरकारी लापरवाही को दोषी ठहराया और सरकार से मांग की कि ऐसी आपातकालीन स्थितियों में मदद मांगने के लिए आम लोगों को अलग फोन नंबर दिया जाए, जिस पर कभी भी कॉल करके मदद मांगी जा सके।

उस शख्स की मांग को सरकार ने सुना और आज ही के दिन 1937 में दुनिया का पहला इमरजेंसी नंबर 999 लॉन्च किया गया। इस नंबर को लंदन में 19 किलोमीटर के दायरे में शुरू किया गया। लॉन्च होने के एक हफ्ते के भीतर ही इस नंबर पर पहला कॉल आया। ये कॉल चोरी की सूचना देने के लिए था और पुलिस ने समय पर पहुंचकर चोर को पकड़ भी लिया।

वेल्स के ट्रेफर में इमरजेंसी कॉल के लिए बनाया गया एक टेलीफोन बूथ।

वेल्स के ट्रेफर में इमरजेंसी कॉल के लिए बनाया गया एक टेलीफोन बूथ।

इमरजेंसी के लिए 999 नंबर को चुनने के पीछे भी एक वजह थी। दरअसल उस समय के पे-फोन और रोटेटिंग डायल वाले फोन में ये नंबर आसानी से डायल किया जा सकता था। धीरे-धीरे ये सर्विस पॉपुलर होने लगी और 1976 में इसे पूरे ब्रिटेन में शुरू किया गया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कई देशों में ये सर्विस शुरू की गई। 1968 में अमेरिका ने भी 911 इमरजेंसी सर्विस शुरू की।

हालांकि अभी तक इस सर्विस के साथ एक परेशानी थी। ऐसे लोग जो बचपन से ही बोल नहीं सकते थे या इमरजेंसी में उनका बोलना खतरे से खाली नहीं था वे लोग कैसे अपनी शिकायत दर्ज करें। इस परेशानी का भी हल निकाला गया और साइलेंट सॉल्यूशन 55 सर्विस शुरू की गई। अब आपके पास ये सुविधा थी कि आप 999 पर कॉल कर खांस कर या दूसरे किसी तरीके से बता सकते थे कि आप खतरे में हैं। आप अगर ऐसा भी नहीं कर सकते तो 55 दबाकर पुलिस से मदद मांग सकते हैं।

999 नंबर आज भी कई देशों में काम करता है और इस पर रोजाना हजारों कॉल्स आते हैं।

1938: पहली बार सामने आया ‘सुपरमैन’

बच्चों से लेकर बड़ों तक का बेहद पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर सुपरमैन आज ही के दिन पहली बार कॉमिक्स के पन्नों पर नजर आया था। इस कॉमिक की कहानी जेरी सीगल ने लिखी थी और जो शुस्टर ने सुपरमैन को पन्नों पर उकेरा था। 30 जून 1938 को ये पहली बार दर्शकों के सामने आया।

जेरी की कहानी के मुताबिक सुपरमैन का जन्म क्रिप्टोन ग्रह पर हुआ था और उसका नाम काल-एल था। जब क्रिप्टोन ग्रह पर भयंकर विनाश के आसार नजर आने लगे तो सुपरमैन के पैरेंट्स ने उसे एक स्पेसक्राफ्ट के जरिए धरती पर भेज दिया।

एक्शन कॉमिक्स में पहली बार नजर आया था सुपरमैन।

एक्शन कॉमिक्स में पहली बार नजर आया था सुपरमैन।

धरती पर इस बच्चे को मार्था और जोनाथन केंट पालने लगते हैं। धीरे-धीरे सुपरमैन की शक्तियों का पता उसके पैरेंट्स को चलने लगता है और उसे ‘मैन ऑफ स्टील’ की उपाधि मिलती है।

जेरी सीगल ने साल 1933 में ही ‘द रेन ऑफ सुपरमैन’ नाम से कहानी पब्लिश की थी। इस कहानी में सुपरमैन अपने बनाए हुए वैज्ञानिक को ही मार देता है और एक विलेन बन जाता है। कहा जाता है कि सुपरमैन को विलेन से हीरो बनाने के लिए क्रिप्टोन ग्रह की थ्योरी रची गई।

कुछ सालों तक जेरी और शुस्टर अपने इस आइडिया को अखबारों में छापने के लिए लोगों से बात करने लगे। आखिरकार डीसी कॉमिक्स ने उन्हें इस पूरे आइडिया को 13 पेज की स्टोरी में बदलने को कहा। इसी बुक में पहली बार सुपरमैन नजर आया था।

उसके बाद तो सुपरमैन रेडियो सीरियल, कॉमिक्स और फिल्मों का चहेता किरदार बन गया। साल 1941 में एनिमेटेड शॉर्ट फिल्म में पहली बार सुपरमैन पर्दे पर नजर आया। इस फिल्म में पहली बार सुपरमैन को उड़ता हुआ दिखाया गया। इससे पहले सुपरमैन केवल लंबी छलांग लगा सकता था।

साल 1948 में सुपरमैन की पहली फिल्म आई जिसमें कर्क एलेन ने सुपरमैन का किरदार निभाया था। साल 2014 में इसकी पहली बुक की एक प्रति 24 करोड़ रुपए में नीलाम हुई।

30 जून के दिन को इतिहास में और किन-किन महत्वपूर्ण घटनाओं की वजह से याद किया जाता है…

2019: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्थ कोरिया के लीडर किम जोंग उन से मुलाकात की। ट्रंप नॉर्थ कोरिया जाने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने।

2000: अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने डिजिटल सिग्नेचर को मान्यता दी।

1965: भारत-पाकिस्तान ने युद्धविराम की घोषणा की।

1934: एडोल्फ हिटलर ने अपने कई विरोधी नेताओं की हत्या करवा दी।

खबरें और भी हैं…



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