India’s Singhbhum is the first island to come out of the ocean, 200 million years older than US-Australia | दुनिया में सबसे पहले समुद्र से बाहर आने वाला द्वीप हमारा सिंहभूम, अफ्रीका-ऑस्ट्रेलिया से भी 20 करोड़ साल पुराना

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34 मिनट पहले

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  • अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व भारत के 8 वैज्ञानिकों की रिसर्च टीम ने भास्कर के लिए लिखी समुद्र से जमीन के बाहर आने की कहानी।
  • 7 साल पहाड़ों में बिताए, 4 क्विंटल पत्थर ले गए तब पता चला सिंहभूम है दुनिया का पहला द्वीप।
  • दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित जर्नल ‘प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी आफ साइंस’ ने 6 माह जांच के बाद किया सत्यापित।

जब हमने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारण करने की कोशिश की तब हमें पता चला यह आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था। इसका मतलब यह हुआ कि आज से 320 करोड़ों साल पहले यह प्रांत एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था। अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले। लेकिन हमने पाया कि सिंहभूम क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले पानी से बाहर आया। हमारा दावा कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है।

7 साल के फील्डवर्क में 400 किलोग्राम पत्थरों का अध्य्यन किया
हमारा सौरमंडल, हमारी पृथ्वी या दूसरे ग्रह कैसे बने? इन सवालों की खोज में मैं और मेरी टीम के सात साथियों, जिनमें चार भारत से थे, ने सात साल तक झारखंड के कोल्हान और ओडिशा के क्योंझर व अन्य जिलाें के पहाड़-पर्वतों काे छान मारा। पृथ्वी से जमीन कब बाहर निकली, इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए जुनून जरूरी था। ये जगह नक्सल प्रभावित है । लेकिन हमने तय किया था कि करना है, सो करना है।

अपने 6-7 साल के फील्ड वर्क में लगभग 300-400 किलोग्राम पत्थरों का लेबोरेट्री में अध्ययन किया है। इन पत्थरों में कुछ बलुआ पत्थर थे और कुछ ग्रेनाइट। हमने जो बलुआ पत्थर देखें, उनकी खासियत यह थी कि उनका निर्माण नदी या समुद्र के किनारे हुआ था। नदी या समुद्र का किनारा तभी हो सकता है, जब आसपास भूखंड हो।

जब हमें पता चला कि सिंहभूम समुद्र से सबसे पहले बाहर आया तो यह सबसे रोमांचक पल था
जब हमने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारण करने की कोशिश की, तब हमें पता चला- यह आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था। इसका मतलब यह हुआ कि आज से 320 करोड़ साल पहले यह प्रांत एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था।

अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले। लेकिन हमने पाया कि सिंहभूम क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले बाहर आया। हमारा दावा कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है, यह हमारी पूरी टीम के लिए बड़ा ही रोमांचक पल था।

320 करोड़ साल पहले समुद्र की सतह से ऊपर आया था सिंहभूम
हमने सिंहभूम के ग्रेनाइट पत्थर की जब जांच की तो यह पता चला- सिंहभूम महाद्वीप आज से तकरीबन 350 से 320 करोड़ साल पहले हुए लगातार ज्वालामुखी गतिविधियों से बना था। इसका मतलब यह हुआ कि 320 करोड़ साल पहले सिंहभूम महाद्वीप समुद्र की सतह से ऊपर आया, पर उसके बनने की प्रक्रिया उससे भी पहले शुरू हो गई थी।

बता दें कि यह क्षेत्र उत्तर में जमशेदपुर से लेकर दक्षिण में महागिरी तक, पूर्व में ओडिशा के सिमलीपाल से पश्चिम में वीर टोला तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र को हम सिंहभूम क्रेटान या महाद्वीप कहते हैं। शोध के लिए हमने पिछले 6-7 साल में कई बार सिंहभूम महाद्वीप के कई हिस्सों में फील्ड वर्क किया जैसे कि सिमलीपाल, जोडा, जमशेदपुर, क्योंझर इत्यादि। अध्ययन के दौरान हमारा केंद्र जमशेदपुर और ओडिशा का जोड़ा शहर था। यहीं से कभी बाइक से कभी बस-कार से फील्ड वर्क पर निकलते थे।

आगे की रिसर्च के लिए राह खुली
सिंहभूम दुनिया का पहला द्वीप है जाे समुद्र से बाहर निकला यानी यहां के आयरन ओर की पहाड़ियां या जाे अन्य पहाड़ियां हैं, ये 320 करोड़ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। इस रिसर्च के मॉड्यूल से अन्य पहाड़ी इलाकों अथवा पठारी क्षेत्र में आयरन, गोल्ड माइंस खोजने में सहूलियत हाेगी। इसके अलावा बस्तर, धारवाड़ इलाकों में भूमिगत घटनाओं की उत्पति की जानकारी मिलेगी। पृथ्वी व भू-गर्भीय अध्ययन के लिए यह रिसर्च बहुत उपयोगी साबित होगी।

कोलकाता-बारीपदा से कुरियर के जरिए ऑस्ट्रेलिया भेजते थे पत्थर
हमारी टीम अलग-अलग समय पर शोध के लिए भारत पहुंची। इस दाैरान तीन से चार क्विंटल पत्थर रिसर्च के लिए इकट्ठे किए। उन्हें बारीपदा और कोलकाता के रास्ते ऑस्ट्रेलिया के लिए कुरियर से भेजा। हम लोग स्थानीय होटल या ढाबे में खाना खाते थे और रिसर्च के लिए जंगल व पहाड़ों काे निकलते थे। हमारा फील्ड वर्क 2017 और 2018 में ज्यादा रहा। हम खासतौर से बताना चाहते हैं कि नक्सल प्रभावित एरिया हाेने के बावजूद कभी परेशानी नहीं हुई।

सैंपल कलेक्शन में स्थानीय लोगों ने काफी मदद की
हम पत्थरों को उनके प्राकृतिक रूप में समझने की कोशिश करते थे। जैसे उनका स्वरूप कैसा है, उनका रंग क्या है, वह कितनी आसानी से टूट सकते हैं, वह कितनी दूर तक फैले हुए हैं आदि। हम अलग-अलग समय में आते थे। कभी बरसात, कभी गर्मी के दिनाें में। फील्ड वर्क में सबसे कठिन काम यह ढूंढना होता था कि पत्थर कहां पर मौजूद हैं।

हमारे पास मैप होते थे, लेकिन ज्यादातर समय छोटी चट्टानें या फिर सड़कों के किनारे या नदी नालों के किनारे स्थित पत्थरों तक पहुंचने के लिए हमें स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ी। सिंहभूम में फील्ड वर्क करने के दौरान ऐसी काफी परिस्थितियां आईं, जब स्थानीय लोगों ने हमें पत्थर ढूंढने में बहुत मदद की थी।

पत्थरों को प्राकृतिक रूप में जांचने के बाद हम उनका सैंपल कलेक्ट करते और लैबोरेट्रीज में ले जाते। हम 5-5 किलो के थैलों में सैंपल कलेक्ट करते थे। सैंपल कलेक्ट करने के लिए हम पत्थरों को हथौड़े से मारकर उनके टुकड़े करते। यह भी एक कठिन काम था।

कभी-कभी ऐसे पत्थर मिलते थे, जिन्हें तोड़ने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी। इन सैंपल को हम लैबोरेट्री में ले जाते थे। वहां यह खोज की जाती थी कि वह किन- किन रासायनिक तत्वों से बने थे जैसे- लोहा, मैग्नीशियम, ऑक्सीजन वगैरह। आखिरकार हमारे संघर्ष का मुकाम सुखद रहा। इस तरह हमने पाया कि समुद्र से निकलने वाला द्वीप हमारा सिंहभूम ही था।

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