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Kisan agitation: Guarantee of neither MSP nor timely resolution of disputes, hoarding big fear | किसान आंदोलन: गारंटी न एमएसपी की, न विवादों के समय पर हल की, जमाखोरी बड़ा डर


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प्रमोद कुमार । नई दिल्ली27 मिनट पहले

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किसानों का दिल्ली की ओर कूच। तस्वीर गुरुवार की है।

  • किसानों से जुड़े तीनों कानूनों में आखिर ऐसा क्या है, जो विरोध नहीं थम रहा…।

सितंबर के लोकसभा सत्र में केंद्र सरकार किसानों से जुड़े तीन बिल लेकर आई। विरोध के बावजूद बिल कानून बन चुके हैं। पंजाब और हरियाणा में किसानों का सर्वाधिक विरोध है। किसान दिल्ली कूच कर चुके हैं। आखिर क्या हैं ये कानून और क्यों हो रहा है विरोध, जानिए।

पहला कानून-आवश्यक वस्तु (संशोधन) 2020

पहले कानून क्या था?

1955 में आवश्यक वस्तु कानून लाया गया था। इसमें आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी रोकने के लिए प्रावधान था। किसी सामान को आवश्यक वस्तुओं की लिस्ट में जोड़ने का मतलब है कि सरकार उस वस्तु की कीमत, उसका उत्पादन, उसकी सप्लाई को कंट्रोल कर सकती है। ऐसा अक्सर प्याज और दालों के दाम बढ़ने पर देखा जाता है।

नए कानून में क्या है?

अनाज, दलहन, आलू, प्याज़, तिलहन और तेल की सप्लाई पर अति-असाधारण परिस्थिति (युद्ध, अकाल, कीमतों में अप्रत्याशित उछाल या फिर गंभीर प्राकृतिक आपदा)में ही सरकार नियंत्रण लगाएगी। जमाखोरी पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया है। मतलब व्यापारी कितना भी अनाज, दालें, तिलहन वगैरह जमा करके रख सकते हैं।

विरोध क्यों?

इस कानून को लेकर किसानों का कहना है कि ये तो व्यापारियों को स्टॉक करने का अधिकार देने वाला बिल है। आशंका है कि किसान से व्यापारी सस्ते में फसल खरीदेंगे और स्टॉक करके महंगे दामों पर आम आदमी को बेचेंगे। इससे व्यापारियों का किसान की फसल से लेकर बाजार तक पर कब्जा हो जाएगा।

दूसरा कानून {कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण)

पहले कानून क्या था?

एपीएमसी यानी एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एंड लाइव स्टॉक मार्केट कमेटी को सरल भाषा में मंडी कहते हैं। यहां उत्पादन बेचने पर राज्य सरकारें व्यापारियों से टैक्स लेती हैं और मंडियों का संचालन करती हैं। सरकारी खरीद भी इन मंडियों से होती है। हर राज्य में इनसे जुड़ा एपीएमसी एक्ट भी होता है।

नए कानून में क्या है?

नए कानून में अब मंडी की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। किसान एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपना उत्पाद बेच सकते हैं। वो दूसरे ज़िलों और राज्यों में भी अपनी फसल बेच सकते हैं। इसके लिए उनको या उनके खरीदारों को एपीएमसी मंडियों को कोई फीस भी नहीं देनी होगी।

विरोध क्यों?

ज्यादा विरोध इसी बिल से है। सरकार का कहना है कि हम यानी सरकारी खरीद जो मंडियों में होती है उसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य देना जारी रखेंगे। किसान का तर्क है कि जब आप पूरे देश में खरीद-बिक्री का नियम ला रहे हो तो निजी क्षेत्र में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य अनिवार्य क्यों नहीं कर रहे हैं।

  • कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं- सरकार जो आज कानून लाई है वो बिहार में 2006 से जारी है। बिहार में बाहर खरीद शुरू होने से मंडियां अस्तित्वहीन हो गईं और कॉर्पोरेट व्यापारियों के कारण बिहार के किसानों को भटकना पड़ता है। बिहार में केवल 1% किसान ही फसल समर्थन मूल्य पर बेच पाते हैं।

तीसरा कानून-कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार

पहले कानून क्या था?

इस बिल से पहले भी किसान और व्यापारी में एग्रीमेंट होता था। लेकिन कोई ऐसा कानूनी तरीका नहीं था कि सबसे पहले शिकायत कहां करें? मतलब किसान या व्यापारी थाने में भी शिकायत कर सकता था और सीधे कोर्ट भी जा सकता था।

नए कानून में क्या है?

यह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को वैधता प्रदान करता है। फसल की ओनरशिप किसान के पास रहेगी और उत्पादन के बाद व्यापारी को तय कीमत पर उत्पाद खरीदना होगा। कोई विवाद होता है तो एसडीएम फिर कलेक्टर और उसके बाद कोर्ट में शिकायत होगी।

विरोध क्यों?

कानून के जानकारों का कहना है कि विवाद निराकरण का तरीका गलत है। क्योंकि शिकायत निपटारे की समयसीमा तय नहीं है। किसान इतना स्मार्ट नहीं है कि खुद केस को लड़ सके, जबकि कंपनी तो अपना वकील खड़ा करके किसान को उलझा देगी।

पंजाब-हरियाणा में सर्वाधिक विरोध

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं- पंजाब में 1840 खरीद केंद्र हैं। मंडी में 6 फीसदी टैक्स लगता है जिससे मंडियों में सुविधा दी जाती है। मंडियों तक रास्ते बनाए गए हैं और पंजाब हरियाणा के लगभग 85 प्रतिशत किसान एमएसपी पर फसल बेचते हैं। इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर सबसे ज्यादा गुस्सा यहीं के किसानों में है।

कृषि एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

विपक्ष में… देवेंद्रर शर्मा

  • कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े कानून पर किसान का कहना है कि वह बंधुआ हो जाएगा। क्योंकि सरकार ने न्यूनतम मूल्य की बात नहीं की है।
  • बिल में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार चुप है। जब मंडियां ही खत्म हो जाएंगी तो किसान कहां जाएगा। बिहार के केवल 1% किसानों को समर्थन मूल्य मिल पाता है। यही हाल पूरे देश के किसानों का होगा।
  • जब मंडी में टैक्स लगेगा और बाहर नहीं लगेगा तो मंडियों का रखरखाव कैसे होगा। मंडी खत्म तो सरकारी व्यवस्था खत्म। किसान केवल पूंजीपतियों पर निर्भर रह जाएंगे।

पक्ष में… विजय सरदाना

  • इससे गांवों का समग्र विकास हो सकेगा। शहरों पर निर्भरता कम होगी। बिचौलिए खत्म हो जाएंगे। सीधे किसान को पैसा मिलेगा।
  • केंद्र सरकार चाहे तो भी मंडी बंद नहीं कर सकती, क्योंकि संविधान के अनुसार मंडियां नहीं हटाई जा सकतीं और मंडियां चलाना राज्य सरकार का काम है। उन्हें कौन रोकेगा।



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