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Listened to the scientists and shared every information with them, in India, writing scientific letters and asking for data from the government: Malcolm | वैज्ञानिकों की सुनी और हर जानकारी उनसे साझा की, भारत में तो वैज्ञानिक पत्र लिखकर सरकार से डेटा मांग रहे: मैल्कम


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नई दिल्ली36 मिनट पहले

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एनएचएस के पूर्व चेयरमैन मैल्कम जॉन ग्रांट ने मीडिया प्लेटफाॅर्म इंक्वायरी से विशेष बातचीत की। - Dainik Bhaskar

एनएचएस के पूर्व चेयरमैन मैल्कम जॉन ग्रांट ने मीडिया प्लेटफाॅर्म इंक्वायरी से विशेष बातचीत की।

  • ब्रिटिश नेशनल हेल्थ सर्विस के पूर्व चेयरमैन से खास बातचीत, कहा-जॉनसन सरकार ने टीकों के लिए अरबों डॉलर एडवांस दिए

कोरोना की दूसरी लहर में जो तकलीफें भारत झेल रहा है, वह ब्रिटेन और अमेरिका पहले ही झेल चुके थे। पर तेजी से टीकाककरण, आने वाली चुनौतियों को समझकर रणनीति तैयार कर उन्होंने संक्रमण से होने वाली मौतों पर लगभग रोक लगा दी।

ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) को भी इसका श्रेय है। एनएचएस के पूर्व चेयरमैन मैल्कम जॉन ग्रांट ने मीडिया प्लेटफाॅर्म इंक्वायरी से विशेष बातचीत की। महामारी से मिले सबक, भविष्य की महामारियां, लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां और इसमें इनोवेशन की भूमिका जैसे मुद्दों पर उनसे चर्चा हुई, पढ़िए प्रमुख अंश…

राजनीतिक नेतृत्व पर

दरअसल ब्रिटेन में पिछले साल मार्च में महामारी फैली, उस वक्त इटली में चरम पर थी। ब्रिटिश सरकार ने सोचा कि ये चीन तो है नहीं, लोग लॉकडाउन मंजूर नहीं करेंगे। विरोध भी हुए। सरकार ने फैसला लेने में देर कर दी। अमेरिका में ट्रम्प महामारी को नकारते रहे, मास्क बिना चुनावी रैलियां होती रहीं। हाल में भारत में भी कुछ जगह ऐसा हुआ। अब स्थिति यह है कि ब्रिटेन में हफ्तेभर में 7 से भी कम मौतें हो रही हैं।
टीकाकरण और हेल्थ इंफ्रा

ब्रिटेन में एनएचएस धर्म की तरह है। इसका उद्देश्य है लोगों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं पूरी तरह मुफ्त में मिले। वैक्सीन की सप्लाई को लेकर एनएचएस शुरू से ही आक्रामक रहा। नेशनल टास्क फोर्स बनाई, इसमें सरकार का दखल नहीं था। सरकार ने भी दवा कंपनियों को रिसर्च और टीकों के लिए अरबों डॉलर अग्रिम दिए। जब देश में 50% बिस्तर भरने लगे तो फिजियोथैरेपिस्ट, डेटिंस्ट तक स्वेच्छा से सेवा देने आए, वैक्सीनेशन में भी वे मदद कर रहे हैं। भारत में भी यह संभव है, एक्सपर्ट डॉक्टर हैं, बढ़िया अस्पताल हैं।

डाटा का विश्लेषण करने वाले बेहतरीन लोग हैं। पर हैरानी की बात है कि वैज्ञानिकों को पत्र लिखकर यह मांग करनी पड़ी कि डाटा साझा करें। इसके उलट ब्रिटेन में एनएचएस की हर ईकाई से हर छोटी जरूरी जानकारी साझा की गई, ताकि दूरदराज के छोटे गांवों में बैठे डॉक्टर भी इस समस्या को अच्छी तरह हल कर सकें। पूरे 35 हजार प्रैक्टिशनरों को स्पष्ट था कि क्या और कैसे करना है।
अर्थव्यवस्था खोलने पर

तकरीबन हर देश का नेता यह कहने के लिए आतुर है कि सब खत्म हो गया। हमने भी ऐसा कहा है, पर बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा। सीमाओं पर ध्यान देना होगा, बड़ा खतरा वहीं से है। ब्रिटेन में 68% वयस्क टीके की पहली डोज वहीं 35% दोनों ले चुके हैं। ये बातें हौंसला देती हैं कि हम अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे खोल सकें।
महामारी से सबक

जो गलतियां 2020-21 में हुईं, वो भविष्य में न हों। हमने समय पर सीमाएं बंद नहीं की, इसका खामियाजा भुगता। हमारी यूनिवर्सिटी फार्मा कंपनियों के साथ जुड़कर काम कर रही है। इन यूनिवर्सिटी में हर क्षेत्र का जबर्दस्त टैलेंट है। जीनोमिक्स में भी बढ़िया काम हुआ है। एक और महत्वपूर्ण बात, ब्रिटेन-अमेरिका ने शुरुआती गलतियों से सबक लेकर वैज्ञानिक अनुमानों को स्वीकारना शुरू किया, उसी अनुसार रणनीति बनाई इसलिए वे कोरोना पर काबू पा सके।
महामारी पर प्रतिक्रिया देने में चूक हुई
कोरोना से ब्रिटेन में 1.3 लाख से ज्यादा मौतें हुई हैं। ब्रिटेन और अमेरिका दोनों ही समृद्ध देश हैं, इसलिए सवाल उठा कि वे इसे क्यों नियंत्रित नहीं कर पाए। शुरुआत में भारत का वक्र समतल था, पर पिछले महीने स्थिति बिगड़ गई। दरअसल भारत ने पिछली गर्मी में सोच लिया कि कोरोना को हरा दिया, जबकि वैज्ञानिक दूसरी,तीसरी लहर की चेतावनी दे रहे थे। फिर भी निश्चिंत हो गए।

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