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Misrepresenting the truth is not its victory, it becomes hypocrisy, whatever work we do should not be different from the truth | सच को गलत तरीके से पेश करना उसकी जीत नहीं, पाखंड बन जाता है, हम जो भी काम करें वो सत्य से अलग ना हो


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20 घंटे पहले

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एक बार स्वामी दयानंद सरस्वती अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। वहां बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी। बस कुछ चुनिंदा लोग थे। स्वामीजी की आदत थी कि वे हर किसी की बात को काफी गंभीरता और गहराई के साथ सुनते थे। फिर उसे अपने सत्य की कसौटी पर कसते थे, उसके बाद ही उसका जवाब देते थे। उनका एक शिष्य था, जो उनके काफी करीब था। उसने स्वामी जी से कहा कि आप हर बार ये कहते हैं कि ऐसा करना वेद सम्मत है, ऐसा वेदों में लिखा है इसलिए करना चाहिए। इस तरह की बातें आप ना किया कीजिए। स्वामी जी ने पूछा, फिर मुझे क्या कहना चाहिए? शिष्य ने कहा, आप ऐसे कहा कीजिए कि ये काम करना चाहिए क्योंकि मुझे भगवान ने स्वप्न में आकर ऐसा कहा है या मैंने सपने में ऐसा देखा है। इससे सामने वाले पर आपका ज्यादा अच्छा प्रभाव पड़ेगा। स्वामी जी मुस्कुराए। उन्होंने जवाब दिया, देखो मैं सत्य के प्रचार के लिए निकला हूं। अगर मैं लोगों से ऐसा कहूं कि मुझे भगवान से सपने में आकर ऐसा कहा है तो ये तो झूठ होगा। सत्य का प्रचार झूठी बात से करना तो पाखंड होगा। मैं पाखंड नहीं करना चाहता।

सीख – हम जो भी करते हैं, उसे सत्य और सही रास्ते से ही करना चाहिए। किसी की चापलूसी या गलत सलाह में आकर अपना रास्ता बदलना हमें मंजिल से भटका भी सकता है.

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