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Never listened to the words of the Congress high command, relations were not good with any chief, this time he was defeated by Sidhu | कभी नहीं मानी कांग्रेस हाईकमान की बात, किसी प्रधान से अच्छे नहीं रहे रिश्ते, इस बार सिद्धू से मात खा गए


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जालंधर3 मिनट पहले

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कैप्टन अमरिंदर सिंह। - Dainik Bhaskar

कैप्टन अमरिंदर सिंह।

पंजाब के CM पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कभी कांग्रेस हाईकमान की बात नहीं मानी। पंजाब में वह इंडियन नेशनल कांग्रेस नहीं बल्कि कैप्टन कांग्रेस चलाते रहे। कैप्टन के पंजाब में कांग्रेस के किसी भी प्रधान से रिश्ते अच्छे नहीं रहे। हर बार उन्होंने पार्टी के प्रधान को पटखनी दे दी। यहां तक कि चुनाव में टिकट वितरण में भी कैप्टन ने किसी की नहीं चलने दी। इस बार नवजोत सिद्धू के आगे कैप्टन टिक नहीं पाए। इसकी बड़ी वजह कैप्टन की पार्टी नेताओं से दूरी और पंजाब में अफसरशाही का हावी होना माना जा रहा है।

कैप्टन के आगे नहीं टिक सके हंसपाल, दूलो व केपी

कैप्टन अमरिंदर सिंह को 1999 में पंजाब कांग्रेस का प्रधान बनाया गया। जिसके बाद 2002 में पार्टी ने जीत हासिल की। उनके बाद 2002 में एचएस हंसपाल को प्रधान बनाया गया। वो ज्यादा वक्त नहीं काट सके। इसके बाद जब शमशेर दूलो प्रधान बनाए तो कैप्टन ने उन्हें पंजाब में खड़े नहीं होने दिया। फिर मोहिंदर सिंह केपी को प्रधान बनाया गया। उस वक्त तो कैप्टन ने अपनी टीम को केपी के अधीन काम करने से साफ मना कर दिया। हाईकमान को आंखे दिखाकर कैप्टन काम करते रहे। मजबूरी में कांग्रेस हाईकमान ने 2012 में कैप्टन को फिर प्रधान बना दिया।

सिद्धू से कलह के बाद बाजवा व कैप्टन की मुलाकात हुई थी।

सिद्धू से कलह के बाद बाजवा व कैप्टन की मुलाकात हुई थी।

बाजवा के पैर न उखाड़ सके तो जाट महासभा बना ली

इसके बाद विधानसभा चुनाव हुए लेकिन कांग्रेस को हार मिली। मौका देख हाईकमान ने कैप्टन से कुर्सी से हटा दिया। इसके बाद प्रताप सिंह बाजवा को पंजाब का कांग्रेस प्रधान बना दिया गया। कैप्टन ने उनके पैर भी उखाड़ने की कोशिश की। हालांकि बाजवा भी पंजाब की सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी थे। वो अपने हिसाब से संगठन को चलाते रहे। इसका जवाब देने के लिए कैप्टन ने जाट महासभा बना दी। कैप्टन उसके पदाधिकारियों की नियुक्ति कर कांग्रेस को चुनौती देने लगे।

कांग्रेस दोफाड़ होने के आसार बने तो कैप्टन को प्रधान बनाना पड़ा

उस वक्त पार्टी दोफाड़ होने की स्थिति बन गई थी। कैप्टन ने भी कांग्रेस हाईकमान को इसका इशारा कर दिया। यह भी चर्चा चली थी कि कैप्टन जाट महासभा के जरिए BJP से गठजोड़ कर पंजाब में चुनाव लड़ सकते हैं। इसके बाद हाईकमान को झुकना पड़ा। इसके बाद राहुल गांधी ने बाजवा को समझाया और कैप्टन को फिर प्रधान बना दिया।

कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ पूर्व पंजाब प्रधान सुनील जाखड़।

कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ पूर्व पंजाब प्रधान सुनील जाखड़।

सिद्धू से पहले प्रधान रहे जाखड़ को भी CM हाउस में जलील होना पड़ा

इसके बाद कांग्रेस सत्ता में आई तो सुनील जाखड़ पंजाब कांग्रेस के प्रधान बन गए। उन्हें भी एक बार CM हाउस जाकर जलील होना पड़ा। कैप्टन से मिलने के लिए उन्हें इंतजार कराया गया। यहां तक कि उनके मोबाइल तक निकाल लिए गए। हालांकि जाखड़ ने इस मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया। इसके बाद भी कैप्टन की संगठन से दूरी बनती चली गई। इसी का फायदा नवजोत सिद्धू ने उठाया और उसी को आधार बनाकर कैप्टन की कुर्सी खतरे में पड़ गई।

पंजाब में कांग्रेस प्रधान बनने से पहले सिद्धू की कैप्टन से यह आखिरी मुलाकात थी।

पंजाब में कांग्रेस प्रधान बनने से पहले सिद्धू की कैप्टन से यह आखिरी मुलाकात थी।

इतने ताकतवर इसलिए थे कैप्टन

जब कैप्टन अमरिंदर सिंह एक के बाद एक विरोधी को ठिकाने लगा रहे थे तो उनके साथ माझा की सियासी तिकड़ी तृप्त राजिंदर बाजवा, सुखजिंदर रंधावा और सुखबिंदर सिंह सुख सरकारिया थे। 2017 में चुनाव के दौरान भी यह तीनों कैप्टन के साथ डटे रहे। हालांकि बदलते वक्त में यह तीनों ही कैप्टन से दूर हो गए। अब यह सिद्धू के खेमे में हैं और कैप्टन के खिलाफ पूरी बगावत की अगुवाई की।

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