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Rallod-bhakiu’s Friendship May Change The Political Equation Of Western Up – रालोद-भाकियू की दोस्ती बदल सकती है पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरण


नरेश टिकैत और चौधरी अजित सिंह।
– फोटो : अमर उजाला

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भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत का शुक्रवार को मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत में यह स्वीकारना कि चौधरी अजित सिंह को चुनाव हराकर उन्होंने भूल की है और भविष्य में ऐसी गलती नहीं करेंगे। यह पश्चिमी यूपी में भविष्य की राजनीति का एक संकेत है। भले ही भाकियू अराजनीतिक संगठन हो, लेकिन राष्ट्रीय लोकदल से उसकी नजदीकी नए समीकरण बना सकती है। किसान आंदोलन पर चढ़ते सियासी रंग से विपक्षी दलों को संजीवनी की आस है। यही वजह है कि रालोद ही नहीं, सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी किसान आंदोलन में सक्रिय हो गई हैं।

पश्चिमी यूपी की राजनीति हमेशा किसानों के मुद्दों से प्रभावित होती रही है। इसी किसान राजनीति के भरोसे चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर पहुंचे थे। भले ही दिल्ली बार्डर पर गेहूं, धान समेत अन्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने की मांग उठ रही हो, लेकिन पश्चिमी यूपी में गन्ने के राज्य परामर्शी मूल्य (एसएपी) में वृद्धि की मांग ज्यादा होती है। किसान एसएपी को बचाने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। पश्चिमी यूपी के किसान नेता मानते हैं कि एमएसपी पर संकट आएगा तो गन्ने का एसएपी भी नहीं बचेगा।

नीति आयोग गन्ना मूल्य को चीनी के रेट से जोड़ने का सुझाव दे चुका है। शायद यही वजह है कि पंजाब, हरियाणा से शुरू हुए किसान आंदोलन से पश्चिमी यूपी के किसान खुद को जोड़ रहे हैं। गन्ना पेराई सत्र के तीन माह बीतने बाद भी गन्ना मूल्य की घोषणा नहीं होना भी उनके आक्रोश को बढ़ा रहा है। तीन सालों से गन्ना मूल्य में वृद्धि नहीं होने से भी किसानों में नाराजगी का भाव है। वैसे भी पश्चिमी यूपी किसान आंदोलन की धरती रही है। चौधरी चरण सिंह के बाद चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत उत्तरी भारत के प्रमुख किसान नेताओं में शुमार रहे हैं।
तीन कृषि कानूनों की समाप्ति व एमएसपी की गारंटी की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में 26 जनवरी की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बाद किसान आंदोलन बिखरता नजर आ रहा था। भाकियू नेता राकेश टिकैत के आंसुओं ने किसानों में भावनात्मक ज्वार पैदा कर इसे फिर से खड़ा ही नहीं किया, इसका दायरा भी बढ़ा दिया है। यूं तो टिकैत के समर्थन में हरियाणा, पंजाब के किसान भी आए, लेकिन सबसे पहले और सबसे ज्यादा किसान पश्चिमी यूपी के जिलों से ही पहुंचे। 28 जनवरी की रात गाजीपुर बार्डर पर जिस वक्त टिकैत की घेराबंदी और उस जगह के खाली होने की अटकलें लगाई जा रही थी।

उसी वक्त भाजपा विधायक के इशारे पर कुछ लोग नारेबाजी करते हुए वहां पहुंच गए थे। तब रालोद अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह ने राकेश टिकैत को फोन पर हौसला दिया। 29 जनवरी को सवेरे जयंत चौधरी गाजीपुर बार्डर पर पहुंचे। यहीं से पश्चिमी यूपी की राजनीति में समीकरणों के बदलाव की शुरुआत हुई। जयंत 29 जनवरी को ही मुजफ्फरनगर में भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत के आह्वान पर बुलाई गई महापंचायत में शामिल हुए। इसमें नरेश टिकैत और जयंत के सुरों से सामाजिक एकता का संदेश गया।

नरेश ने माना कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अजित सिंह को हराकर भूल की है। वहीं, जयंत ने कहा कि लड़ाई अस्तित्व बचाने की है, पुरानी बातों को भूलकर आगे से सबको मिलकर एक रहना है। किसान समुदाय ने भी तालियों से इस पर मुहर लगा दी। यूं तो आंदोलन में आप के सांसद संजय सिंह, कांग्रेस नेता व पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक समेत सभी दलों के नेता थे, लेकिन महफिल नरेश टिकैत व जयंत के नाम ही रही। ऐसे में भाकियू का रालोद के प्रति झुकाव से पंचायत चुनावों और फिर 2022 के विधानसभा चुनावों में पश्चिम यूपी में नए सियासी समीकरण बन सकते हैं।
 
गाजीपुर बार्डर पर 28 जनवरी को जिस वक्त राकेश टिकैत गिरफ्तारी देने की योजना बना रहे थे, तभी भाजपा विधायक के इशारे पर कुछ लोगों के उत्तेजक नारों के साथ ही सिखों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, इससे ही पूरा माहौल बदल गया। इसके बाद टिकैत इतने भावुक हुए कि उनके आंसू बह निकले।

उन्होंने गिरफ्तारी नहीं देने का एलान किया। उधर, मुजफ्फरनगर महापंचायत में नरेश टिकैत ने किसानों को भाजपा से संभलकर रहने के लिए सचेत किया। लोनी के भाजपा विधायक ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जो चिट्ठी ट्वीट की है, उसकी भाषा भी किसानों के आक्रोश को बढ़ाने के लिए काफी है। इस पत्र का भाजपा नेतृत्व ने अभी संज्ञान नहीं लिया है।

भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत का शुक्रवार को मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत में यह स्वीकारना कि चौधरी अजित सिंह को चुनाव हराकर उन्होंने भूल की है और भविष्य में ऐसी गलती नहीं करेंगे। यह पश्चिमी यूपी में भविष्य की राजनीति का एक संकेत है। भले ही भाकियू अराजनीतिक संगठन हो, लेकिन राष्ट्रीय लोकदल से उसकी नजदीकी नए समीकरण बना सकती है। किसान आंदोलन पर चढ़ते सियासी रंग से विपक्षी दलों को संजीवनी की आस है। यही वजह है कि रालोद ही नहीं, सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी किसान आंदोलन में सक्रिय हो गई हैं।

पश्चिमी यूपी की राजनीति हमेशा किसानों के मुद्दों से प्रभावित होती रही है। इसी किसान राजनीति के भरोसे चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर पहुंचे थे। भले ही दिल्ली बार्डर पर गेहूं, धान समेत अन्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने की मांग उठ रही हो, लेकिन पश्चिमी यूपी में गन्ने के राज्य परामर्शी मूल्य (एसएपी) में वृद्धि की मांग ज्यादा होती है। किसान एसएपी को बचाने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। पश्चिमी यूपी के किसान नेता मानते हैं कि एमएसपी पर संकट आएगा तो गन्ने का एसएपी भी नहीं बचेगा।

नीति आयोग गन्ना मूल्य को चीनी के रेट से जोड़ने का सुझाव दे चुका है। शायद यही वजह है कि पंजाब, हरियाणा से शुरू हुए किसान आंदोलन से पश्चिमी यूपी के किसान खुद को जोड़ रहे हैं। गन्ना पेराई सत्र के तीन माह बीतने बाद भी गन्ना मूल्य की घोषणा नहीं होना भी उनके आक्रोश को बढ़ा रहा है। तीन सालों से गन्ना मूल्य में वृद्धि नहीं होने से भी किसानों में नाराजगी का भाव है। वैसे भी पश्चिमी यूपी किसान आंदोलन की धरती रही है। चौधरी चरण सिंह के बाद चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत उत्तरी भारत के प्रमुख किसान नेताओं में शुमार रहे हैं।


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28 जनवरी की रात रही टर्निंग प्वाइंट



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