संपादकीय: दबाव में चीन

आखिर चीन पीछे क्यों हटा? क्या उसने अपनी कोई गलती मान ली, या फिर वह भारतीय रणनीति और दबाव के आगे झुक गया? या फिर उसने जिन इलाकों में घुसपैठ कर कब्जा कर लिया था, उन पर से दावा छोड़ दिया है? इन सवालों का जवाब भारत के कड़े रुख में मिलता है। गलवान घाटी में हिंसा के बाद भारत ने चीन के खिलाफ जिस तरह का सख्त रुख दिखाया और यह साफ संदेश दिया कि आज का भारत 1962 वाला भारत नहीं है, उसके अर्थ चीनी शासक अच्छी तरह समझ रहे हैं।

पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दो महीने से जारी तनाव में अब सुधार के संकेत नजर आने लगे हैं। फिलहाल राहत की बात यह है कि गलवान घाटी के एक गश्ती पाइंट से चीनी सैनिक पीछे हटने शुरू हो गए हैं और अपने तंबू तथा सैन्य साजोसामान हटा लिया है। यह शांति का पहला कदम माना जा सकता है।

इसका असर यह होगा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दो महीने से जो तनावपूर्ण स्थिति बन गई थी, वह खत्म होगी। हालात उस वक्त ज्यादा गंभीर हो गए थे, जब 15-16 जून की रात चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया था। इसमें बीस भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। जवाबी कार्रवाई में चालीस से ज्यादा चीनी सैनिकों के हताहत होने की खबरें आईं। इस हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों में जिस तरह का तनाव बन गया था, उसमें कुछ भी संभव था। कोई भी युद्ध जैसी स्थिति की आशंका से इनकार नहीं कर रहा था।

आखिर चीन पीछे क्यों हटा? क्या उसने अपनी कोई गलती मान ली, या फिर वह भारतीय रणनीति और दबाव के आगे झुक गया? या फिर उसने जिन इलाकों में घुसपैठ कर कब्जा कर लिया था, उन पर से दावा छोड़ दिया है? इन सवालों का जवाब भारत के कड़े रुख में मिलता है। गलवान घाटी में हिंसा के बाद भारत ने चीन के खिलाफ जिस तरह का सख्त रुख दिखाया और यह साफ संदेश दिया कि आज का भारत 1962 वाला भारत नहीं है, उसके अर्थ चीनी शासक अच्छी तरह समझ रहे हैं।

अब तक सैन्य कमांडरों से लेकर कूटनीतिक स्तरों पर बातचीत के जो दौर चले हैं, उनमें भारत का रुख एकदम साफ रहा है कि गलवान घाटी में पांच मई से पहले की स्थिति बहाल हो। भारतीय क्षेत्रों में चीनी घुसपैठ और नए क्षेत्रों को विवादित बनाने की चीन की रणनीति की दुनियाभर में आलोचना हो रही है। ऐसे में चीन के सामने बचाव का एक ही रास्ता था कि वह पीछे हटे और हालात सामान्य बनाए। इसके अलावा चीन को उम्मीद नहीं रही होगी कि भारत सिर्फ सैन्य ताकत से ही नही, बल्कि दूसरे उपायों से भी उसे सबक सिखा सकता है। चीन जानता है कि उसके लिए भारत बड़ा बाजार है, ऐेसे में भारत से युद्ध का खतरा मोल लेना कहीं से भी लाभदायक नहीं रहेगा।

घुसपैठ वाले इलाकों से चीन कब तक अपने सारे सैनिकों और साजोसामान को हटाता है, यह देखने की बात है। अभी सिर्फ गलवान घाटी से ही चीनी सैनिकों के पीछे हटने की खबर है। पैंगोंग झील और हॉटस्प्रिंग को लेकर कोई संकेत नहीं मिला है। चीन का जैसा इतिहास और चरित्र रहा है, उसे देखते हुए उस पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता। 1962 में भी चीनी सेना पहले पीछे हटी थी, उसके बाद पलट कर भारत पर हमला बोल दिया था। यह पीठ में छुरा घोंपना ही था।

जब तक चीन पांच मई के पूर्व वाली स्थिति बहाल नहीं कर देता, तब तक गतिरोध पूरी तरह खत्म नहीं माना जाना चाहिए। इसलिए अब भारत को ज्यादा चौकन्ना रहना होगा और चीन से सैन्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि हर स्तर पर निपटने के लिए आक्रामक रणनीति भी बनानी होगी। पिछले हफ्ते लेह में सैनिकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने साफ कह भी दिया कि अब विस्तारवाद का युग बीत चुका है। चीन को भारत का यह संदेश समझना होगा।

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