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State Legislative Council resolution passed in the assembly, will Didi save the chief minister’s chair without contesting elections? | CM की कुर्सी बचाने के लिए ममता ने खेला बड़ा सियासी दांव, अब केंद्र को भेजा जाएगा प्रस्ताव


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कोलकाताएक घंटा पहले

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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने बिना चुनाव लड़े मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने का बड़ा सियासी दांव चल दिया है। दरअसल, राज्य विधानसभा से मंगलवार को विधान परिषद के गठन का बिल पारित हो गया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने विधानसभा में इस प्रस्ताव को पेश किया था। प्रस्ताव के पक्ष में 196 विधायकों ने वोट दिए, जबकि 69 ने इसका विरोध किया।

नंदीग्राम से हारने के बाद 6 महीने में किसी सीट से ममता के लिए जीतना जरूरी
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी नंदीग्राम में अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के शुभेंदु अधिकारी से हार गई थीं। इसके बाद भी ममता ने 4 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। संवैधानिक नियमों के मुताबिक, उन्हें अगले 6 महीने में राज्य की किसी सीट से उपचुनाव में जीत हासिल करना जरूरी है।

ममता बनर्जी ने राज्य की कमान संभालने के 14 दिनों के भीतर ही राज्य विधानसभा के उच्च सदन विधान परिषद बनाने के कैबिनेट के फैसले को मंजूरी दी थी। इसके बाद ये अटकलें लगाई जाने लगीं कि वे विधान परिषद के रास्ते अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचा ले जाएंगी। हालांकि विधान परिषद के अलावा ममता के पास भवानीपुर से उपचुनाव लड़ने का भी विकल्प है। भवानीपुर ममता की पारंपरिक सीट रही है।

उत्तराखंड में तीरथ सिंह रावत को भी इसी आधार पर हटना पड़ा
बता दें कि यही स्थिति तीरथ सिंह रावत की भी थी। उन्हें सांसद होते हुए राज्य का सीएम बनाया गया था, वे विधानसभा के सदस्य नहीं थे, इसलिए पार्टी ने उनसे 2 जुलाई को इस्तीफा दिलवा दिया। उत्तराखंड विधानसभा का 5 साल का कार्यकाल 17 मार्च 2022 को पूरा हो रहा है।

यानी यहां अगले साल फरवरी 2022 में चुनाव होने हैं। ऐसे में यहां उपचुनाव नहीं हो सकते थे। इसलिए रावत के पास इस्तीफे के अलावा कोई चारा नहीं था। इस घटना के बाद यह भी आशंका जताई जाने लगी कि ममता बनर्जी को भी बंगाल में इसी आधार पर हटाया जा सकता है। हालांकि, उत्तराखंड के जैसी बंगाल में उपचुनाव को लेकर कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है। यहां उपचुनाव कराए जा सकते हैं।

केंद्र से बिल पास करवाना ममता के लिए मुश्किल
राज्य विधानसभा से विधान परिषद के गठन का बिल पारित होने के बाद ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी मुश्किल इसे केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत पश्चिम बंगाल में विधान परिषद के गठन का अधिकार दिया गया है। विधान परिषद के निर्माण के लिए बिल को संसद के समक्ष पेश करना जरूरी होता है। साथ ही इसके लिए राष्ट्रपति की सहमति की भी आवश्यकता होती है। संसद में बीजेपी बहुमत में है इसलिए ममता चाह कर भी इसे पास नहीं करवा सकेंगी। हालांकि, अगर बीजेपी को वो मनाने में कामयाब होती हैं तो उनकी राह आसान हो जाएगी।

बंगाल में हो सकती हैं 98 सीटें
विधान परिषद के पास विधानसभा की कुल सीटों के एक तिहाई से अधिक नहीं होना चाहिए। ऐसे में परिषद के पास अधिकतम 98 सीटें हो सकती हैं। सदस्यों में से 1 तिहाई सदस्य विधायकों द्वारा चुने जाएंगे, जबकि अन्य 1 तिहाई सदस्य नगर निकायों, जिला परिषद और अन्य स्थानीय निकायों द्वारा चुने जाएंगे। सरकार द्वारा परिषद में सदस्यों को मनोनीत करने का भी प्रावधान होगा। राज्यसभा की तरह ही इसमें भी एक सभापति और एक उपाध्यक्ष होते हैं। सदस्यों की आयु कम से कम 30 साल होनी चाहिए। उनका कार्यकाल 6 साल का होगा। राज्यपाल भी कुछ सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं।

बंगाल में 1952 में रह चुका है विधान परिषद
बंगाल के पहले मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने 1952 में विधान परिषद का गठन किया था, जो कि 1969 तक जारी रहा। लेकिन दूसरी संयुक्त मोर्चा सरकार ने इसे समाप्त कर दिया। बंगाल की अंतिम विधान परिषद में 75 सदस्य थे, जिनमें से नौ को राज्यपाल द्वारा मनोनीत किया गया था।

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