Thousands of acres of land dug by mafia in Jharkhand | झारखंड में खेतों की उपजाऊ परत खत्म हो रही, हजारों एकड़ जमीन माफिया ने खोद डाली

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रांची2 घंटे पहले

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झारखंड में धरती मां का सीना छलनी हो रहा है। 54.80 लाख हेक्टेयर भूमि बंजर हो रही है। राज्य के 24 जिलों में दैनिक भास्कर इन्वेस्टिगेशन के दौरान यह सच सामने आया कि खेती की जमीन की 15 सेंटीमीटर सबसे ऊपरी और उपजाऊ परत खत्म हो गई है। जल प्रबंधन के बिना यह परत बारिश के पानी के साथ नालों और नदियों में बह गई। खेती से अलग जो जमीन बची है, उस पर माफिया की नजर है। पत्थर माफिया ने हजारों एकड़ में अवैध खनन के बाद जमीन खोदकर छोड़ दी है।

भू संपदा को बर्बाद करने के लिए सिस्टम जिम्मेदार
1. बारिश से बही उपजाऊ परत, 69% भूमि बंजर

ISRO के अनुसार, झारखंड में लगातार बंजर भूमि बढ़ती जा रही है। जल प्रबंधन नहीं होने से बारिश अपने साथ उपजाऊ परत बहा ले जा रही है। इससे मरुभूमि बढ़ती जा रही। 69% भूमि बंजर हो गई है। झारखंड में भू-सपंदा की हालत दयनीय है। खेतों की उपजाऊ परत खत्म हो रही है, हजारों एकड़ जमीन माफिया ने खोद डाली है….

2. कीटनाशक से पोषक तत्व घटे, इम्युनिटी कमजोर हुई
80% मिट्टी अम्लीय हो चुकी है। इसमें 50% मैगनीज और कैल्शियम खत्म हो चुके हैं. इनके घटने से हमारी इम्युनिटी भी घट रही है। ये गलत फसल चक्र अपनाने का नतीजा है, पर किसान प्रशिक्षित नहीं किए जा रहे।

3. माफिया ने हजारों एकड़ जमीन खोदकर छोड़ दी
पत्थर माफिया ने अवैध खनन के बाद हजारों एकड़ जमीन खोखली कर दी है। रैयतों-किसानों की जमीन पर भी कब्जा कर रहे हैं। प्रशासन अवैध खनन पर अंकुश लगाने में नाकाम है।

जानिए कैसे हाथ से फिसलती जा रही है हमारी मिट्टी?

  • 54.80 लाख हेक्टेयर भूमि झारखंड में बंजर होने के कगार पर है। यह कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 68.77% है। यह भूमि अब फसल देने की स्थिति में नहीं है। देश में झारखंड की स्थिति बंजरपन में सबसे खराब है।
  • जमीन में फॉस्फेट सोल्यूबिलाइजिंग बैक्टीरिया (PSB) 90% से ज्यादा कम हो चुके हैं। ये बैक्टीरिया खेती के लिए जरूरी होते हैं । खूंटी, सिमडेगा, जामताड़ा, गिरिडीह के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा बंजर भूमि मिली।
  • मिट्टी की पीएच (पावरऑफ हाइड्रोजन) वैल्यू घटकर 4.5 तक पहुंच गई है। इसका आदर्श मानक 6.5-7 तक होता है।
हजारों एकड़ जमीन खोखली की, अवैध खनन रोकने वाला कोई नहीं

हजारों एकड़ जमीन खोखली की, अवैध खनन रोकने वाला कोई नहीं

जमीन के लिए जंगल में आग
जमशेदपुर के चाकुलिया जंगल के बीच में शराब माफिया आग लगा रहे हैं। ताकि, उनकी भट्टियां लग सकें और शराब बनाने के लिए सूखी लकड़ी जलाबन के काम आ सके। माफिया 20-25 एकड़ में जंगल खाक कर चुके हैं।

मिट्टी के पोषक तत्व तेजी से घट रहे, इससे इम्युनिटी भी घटी
मिट्‌टी की एक परत को तैयार होने में 1,000 साल लग जाते हैं। 15 सेंटीमीटर की सबसे ऊपरी सतह एक परत मानी जाती है, जो सबसे अधिक उपजाऊ होती है। झारखंड में जल प्रबंधन के बिना बारिश के पानी के साथ यह परत नालों-नदियों में बह गई। पूरे झारखंड की 80% मिट्‌टी अम्लीय हो चुकी है। यही कारण है कि जो मिट्टी पहले पानी सोख ले रही थी, अब उसी पानी में बह जा रही है। हम खूंटी के खेतों से गुजर रहे हैं। यहां धान बर्बाद हो गया है।

किसान कह रहे हैं कि मिट्‌टी खराब हो गई है। फसल नहीं दे रही। वैज्ञानिक वर्षों से आ रहे हैं और सुझाव देकर चले जा रहे हैं। खूंटी हमारी पड़ताल का मॉडल जिला रहा। क्योंकि जमीन बंजर होने के यहां सबसे अधिक कारण मिले। मिट्‌टी उपजाऊ व पौधे-फसलों को बीमारियों से लड़ने लायक बनाने वाले कैल्शियम-मैग्नीज 50% तक खत्म हो गए हैं। इनके कम होने का असर हमारे शरीर पर भी पड़ रहा है। इससे डायबिटीज और हार्ट के पेशेंट बढ़े हैं। लोगों की इम्युनिटी भी घट रही है।

फोटो जर्नलिस्ट शुभोजित घोषाल और सीनियर रिपोर्टर कन्हैया सिंह

फोटो जर्नलिस्ट शुभोजित घोषाल और सीनियर रिपोर्टर कन्हैया सिंह

15 सेमी. उपजाऊ परत बनने में 1000 वर्ष लगे, अब 90 सेमी. तक उर्वरता खत्म
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार झारखंड में मरुस्थलीकरण बढ़ रहा है। भूमि की गुणवत्ता गिरती जा रही है। राज्य में 2003-05 में करीब 67.97 % फीसदी भूमि की गुणवत्ता खराब बताई गई थी, जो 2011-13 में 68.98% हो गई। हालांकि हालिया सर्वे (2018-19) में यह मामूली .21% घटा है। पूरे राज्य के सफर में हमने पाया कि 15 सेमी की सबसे ज्यादा उपजाऊ परत से तिगुने ज्यादा में पोषक तत्व खत्म हो चुके हैं। यानी 90 सेमी तक की भूमि में उर्वरता खत्म हो गई है।

किसानों ने बताया कि अम्लीय भूमि बढ़ने से कई तरह की परेशानी आ रही है। पौधों की जड़ों की सामान्य वृद्धि अचानक रुक जा रही है। मैगनीज और आयरन की मात्रा बढ़ रही है, जिससे पौधे में बीमारियां हो रही हैं। फॉस्फोरस व मोलिब्डेनम की घुलनशीलता कम हो गई है, पौधों को ये तत्व नहीं मिल पा रहे। खेती के लिये जरूरी फॉस्फेट सॉल्युबिंग बैक्टीरिया (पीएसबी) जमीन में 90% से अधिक कम हो चुके हैं। पीएसबी खत्म होने से रासायनिक खाद विघटित नहीं हो रही।

अम्लीय भूमि में कितनी भी रासायनिक खाद डाल रहे हैं तो फसल नहीं हो रही। कई जिलों में आत्मा के अधिकारियों ने बताया कि मिट्टी का पीएच (पावर ऑफ हाइड्रोजन) वैल्यू 6.5-7 से घटकर 4.5 तक पहुंच गया है। खेतों में कटाव के कारण मिट्‌टी के पोषक तत्व कम हो रहे हैं। नीति आयोग ने भी अपनी एक रिपोर्ट में चेताया है झारखंड में जल प्रबंधन देश में सबसे कमजोर है। इसे ठीक करना होगा, नहीं तो कृषि में पिछड़ने पर समग्र विकास में भी राज्य पिछड़ जाएगा।
कोयला माफिया का जमीन पर कब्जा, दिन दहाड़े बड़ी-बड़ी मशीनों से खनन
संतालपरगना प्रमंडल की हमारी पड़ताल में जमीन का दूसरा पहलू दिखा। यहां पत्थर माफिया और खनन माफिया का दबदबा है। दुमका के शिकारीपाड़ा में एमओयू के बाद कई कंपनियों को खान आवंटित किया गया था। रैयतों को नोटिस भेज जमीन खाली करने कहा गया। बताया गया जमीन का मुआवजा मिलेगा। ग्रामीणों ने विरोध किया। उनका नारा था कि जान देंगे, पर जमीन नहीं। विरोध पर कंपनियां भी पीछे हटने लगीं। लेकिन ग्रामीण जिस जमीन के लिए जान की बाजी लगाने की बात कहते रहे, उनकी उसी जमीन पर कोयला माफिया ने पूरी तरह कब्जा जमा लिया है। अवैध खनन जारी है।

वह भी चोरी छुपे नहीं, दिन में और बड़ी मशीनों से हो रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक इसमें सफेदपोश तक शामिल हैं। वहीं, धनबाद और बोकारो की खुली खदानों में कोयला खत्म होने पर खनन बंद होने के बाद सैकड़ों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है। इस जमीन के रैयत व अन्य लोग आज भी विस्थापन का इंतजार कर रहे हैं। सरकार द्वारा इन्हें विस्थापित करने के लिए दूसरी जगहों पर जमीन तलाशी जा रही है। माइनिंग विशेषज्ञों के मुताबिक इन खदानों और डंप को भराई कर पुनः उपयोग के लायक बनाया जा सकता है। इससे विस्थापन कम हो सकता है। इस जमीन पर खेती भी की जा सकती है। इसका उदाहरण छत्तीसगढ़ का सिंगरौली है। यहां के कोलफील्ड्स में 90 के दशक में ही यह सफल प्रयोग हो चुका है।

ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आए तथ्य, एक फसल के पैटर्न से खेत खराब, युवा सालभर बेकार
मिट्‌टी का फसलों से और फसलों का मनुष्य से सीधा संबंध है। मिट्‌टी में कैल्शियम-मैगनीज 50% कम हो गए तो फसलों में भी इनकी उतनी ही मात्रा कम हो गई। भू वैज्ञानिक के अनुसार इसके कारण डायबिटीज और हार्ट पेसेंट बढ़ रहे हैं। कैल्शियम-मैगनीज इसे संतुलित करता है।

  • चतरा, लातेहार, पलामू, गढ़वा सहित अन्य जिलों में एक फसल (मोनोक्रॉप कल्चर) की खेती कर पूरे वर्ष जमीन खाली छोड़ दी जा रही है। ऐसे खेत में कीट सबसे अधिक पनपते हैं। इसके लिए अधिक कीटनाशक का प्रयोग हो रहा है। यह मिट्टी-फसलों को प्रभावित कर रहा।
  • सिमडेगा के कुरडेग प्रखंड के युवकों ने खेती छोड़ गोवा में बसने का मन बनाया है। उनके मुताबिक धान की खेती के बाद उनके पास ना तो काम रहा व ना ही कमाई का जरिया। गाेवा में मछली कंपनी में काम करेंगे।
  • संताल में आदिवासियों ने कहा कि खुटकट्टी-भुइंहरी व्यवस्था अच्छी है, पर जरूरत पड़ने पर जमीन काम नहीं आ रही। बाहरी लोगों को नहीं बेचने की बाध्यता से कीमत काफी कम मिलती है। ऋण भी नहीं मिल रहा।

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