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To take life in the right direction, it is necessary to use the work energy of the body properly, only that the mind is saved from frustrated thoughts. | जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिए शरीर की काम ऊर्जा का सदुपयोग जरूरी है, इससे ही मन कुंठित विचारों से बचता है


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एक घंटा पहले

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सती के देहत्याग के बाद शिव घोर तपस्या में चले गए। शिव के अनिश्चितकाल के लिए तपस्या में जाने से देवता परेशान हो गए, क्योंकि अगर शिव तपस्या से जागेंगे नहीं तो फिर पार्वती से दूसरा विवाह कैसे करेंगे।

देवताओं के राजा इंद्र ने शिव की तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव और कुछ अप्सराओं को भेजा। काफी समय तक वे शिव का ध्यान भंग करने में असफल रहे। फिर, कामदेव ने अपने बाण से बलात शिव का ध्यान तोड़ा। शिव क्रोधित हुए और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया।

कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति शिव के पास आईं। रति ने भगवान शिव से कहा कि आपने मेरे पति को क्यों मारा। उनका क्या दोष था। वे तो सिर्फ अपने राजा की आज्ञा का पालन कर रहे थे। आपको दंड देना है तो इंद्र को दीजिए। मेरे पति को मुझे लौटा दीजिए।

शिव ने कहा, देवी मैंने आपके पति को मारा नहीं है, उसे अनंत जीवन दे दिया है। अब से कामदेव हर जीव के शरीर में अदृष्य रूप में मौजूद रहेंगे, लेकिन रति नहीं मानीं। उन्होंने कहा, मुझे मेरे पति सशरीर चाहिए, न कि अदृष्य रूप में।

तब भगवान शिव ने कहा, अगर तुम्हें तुम्हारे पति सशरीर चाहिए तो उसके लिए तुम्हें दो बातें याद रखनी होंगी। पहली धैर्य और दूसरी संयम। अगर इन दोनों बातों को जीवन में उतार लिया तो द्वापर युग में कामदेव भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे। तभी तुम्हारा उनसे सशरीर मिलन हो पाएगा।

रति ने शिव की बात मानी। वो धैर्य और संयम के साथ द्वापर का इंतजार करने लगीं। द्वापर में कामदेव ने भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लिया और रति मायादेवी के रूप में उनकी पत्नी बनीं।

सीखः भगवान शिव और कामदेव की ये कथा सिखाती है कि हर इंसान के शरीर में काम ऊर्जा समान रूप से है, लेकिन इसका उपयोग करना महत्वपूर्ण है। संयम और धैर्य के अभाव में लोग इस ऊर्जा को संभाल नहीं पाते और अपराध के रास्ते पर चल देते हैं।

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