Most Popular

Social Media

Get The Latest Updates

Subscribe To Our Weekly Newsletter

No spam, notifications only about new products, updates.

Today History 3 May: Aaj Ka Itihas Updates | Pramod Mahajan’s Brother And Killer and Hero Of 1971 Bangladesh War, Jagjit Singh Aurora | 15 साल पहले अटल-आडवाणी के करीबी नेता की उनके ही भाई ने गोली मारकर हत्या की


  • Hindi News
  • National
  • Today History 3 May: Aaj Ka Itihas Updates | Pramod Mahajan’s Brother And Killer And Hero Of 1971 Bangladesh War, Jagjit Singh Aurora

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

36 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

तारीख 22 अप्रैल 2006। बीजेपी के कद्दावर नेता प्रमोद महाजन का मुंबई के वर्ली स्थित घर। उनके छोटे भाई प्रवीण महाजन उनसे मिलने पहुंचे थे। दोनों भाइयों में किसी बात को लेकर 15 मिनट तक बहस हुई। आवेश में आकर प्रवीण ने रिवॉल्वर से प्रमोद पर 3 गोलियां चला दीं। उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां 3 मई 2006 को उनकी मौत हो गई।

बात अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने की हो या लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा की, महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन की हो या शाइनिंग इंडिया का मंत्र देने की, प्रमोद महाजन के जिक्र के बिना अधूरी ही रहती है। एक समय अटल-आडवाणी के करीबी रहे प्रमोद महाजन उस समय पार्टी की सेकंड लाइन के प्रमुख नेता थे।

पत्रकार से लेकर बीजेपी नेता बनने का सफर
प्रमोद का जन्म 30 अक्टूबर 1949 को महबूबनगर (तेलंगाना) में हुआ था। पिता टीचर थे। राजनीतिक बहसों में शुरू से ही आगे रहते। स्कूल में कई डिबेट्स भी जीतीं। इसी दौरान संघ से जुड़े। पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए उन्होंने पुणे के रानाडे इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज्म से पत्रकारिता की डिग्री ली। पत्रकारिता में मौका नहीं मिला तो एक कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाई। जब वे 21-22 साल के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया।

राजनीति पर पकड़ तो थी ही, पत्रकार बनने के गुण भी थे। आरएसएस के मराठी अखबार ‘तरुण भारत’ के उप-संपादक बन गए। 1974 में कॉलेज में पढ़ाना भी बंद कर दिया। फुल-टाइम आरएसएस को देने लगे। इमरजेंसी के दौरान जब देश में इंदिरा गांधी के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा था, संघ भी मैदान में था। प्रमोद ने इंदिरा विरोध का मोर्चा संभाला। 1974 में उन्हें संघ प्रचारक बनाया गया। इमरजेंसी के दौरान उन्होंने आरएसएस के लिए खूब काम किया। उनकी सक्रियता देखते हुए उन्हें भाजपा में शामिल कर लिया गया। 1983 से 1985 तक वह पार्टी के अखिल भारतीय सचिव थे और फिर 1986 में अखिल भारतीय युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने। 1984 में अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन जीत नहीं सके। लगातार 3 बार भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष रहे।

रामरथ का आइडिया
जब देश में राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ने लगा था। भाजपा ने भारी तैयारियां की थीं। उससे पहले 1983 में चंद्रशेखर ने देशभर में पदयात्रा की थी। राम मंदिर आंदोलन के लिए आडवाणी का भी इरादा ऐसी ही पदयात्रा निकालने का था। प्रमोद महाजन ने उन्हें राय दी कि पदयात्रा में समय ज्यादा लगेगा, ज्यादा जगह भी कवर नहीं होगी। पदयात्रा के बजाय रथयात्रा निकालिए। आडवाणी को ये आइडिया जम गया। प्रमोद ने मेटाडोर को रथ में बदला, नाम दिया- रामरथ। आडवाणी की रथयात्रा में प्रमोद की भी बड़ी भूमिका थी।

प्रमोद महाजन पर गोली चलाने वाला उनका भाई प्रवीण महाजन पुलिसकर्मियों के साथ। प्रवीण की ब्रेन हेमरेज होने से मार्च-2010 में ठाणे के हॉस्पिटल में मौत हो गई। इससे प्रवीण और प्रमोद के बीच उस दिन किस बात को लेकर झगड़ा हुआ था, यह आज भी रहस्य बना हुआ है।

प्रमोद महाजन पर गोली चलाने वाला उनका भाई प्रवीण महाजन पुलिसकर्मियों के साथ। प्रवीण की ब्रेन हेमरेज होने से मार्च-2010 में ठाणे के हॉस्पिटल में मौत हो गई। इससे प्रवीण और प्रमोद के बीच उस दिन किस बात को लेकर झगड़ा हुआ था, यह आज भी रहस्य बना हुआ है।

1996 में वाजपेयी सत्ता में आए। प्रमोद अपना पहला लोकसभा चुनाव जीते। उन्हें रक्षा मंत्री बनाया गया। सरकार केवल 13 दिन ही टिकी। 1998 में बीजेपी फिर सत्ता में आई, पर महाजन हार गए। उन्हें राज्यसभा भेजा गया। सूचना-प्रसारण मंत्री रहे और टेलीकॉम पॉलिसी में कई सुधार किए। उन पर वित्तीय गड़बड़ियों और रिलायंस को फायदा पहुंचाने के आरोप भी लगते रहे।

प्रमोद महाजन ने कम समय में ही तेजी से राजनीति में तरक्की की। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना में गठबंधन करवाने में भी उनकी अहम भूमिका थी। प्रमोद पर गोली क्यों चली, इसकी असली वजह कोई नहीं जानता। कहा जाता है कि पारिवारिक संपत्ति को लेकर दोनों भाइयों में विवाद चल रहा था।

लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा (बाएं) का 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान था। उन्हें 'लिबरेटर ऑफ बांग्लादेश' भी कहा जाता है। उन्होंने ही युद्ध की योजना बनाई और उसे अंजाम तक पहुंचाया।

लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा (बाएं) का 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान था। उन्हें ‘लिबरेटर ऑफ बांग्लादेश’ भी कहा जाता है। उन्होंने ही युद्ध की योजना बनाई और उसे अंजाम तक पहुंचाया।

1971 युद्ध के जांबाज का निधन

लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा का जन्म 1916 में पाकिस्तान में हुआ था। सन 1938 में उन्हें सेना में कमीशन मिला। सन 1964 में जनरल ऑफिसर कमांडिंग के रूप में उनको पूर्वी कमान की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1973 में जनरल अरोड़ा सेना से रिटायर हो गए। उन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अपने साहसिक फैसलों के लिए जाना जाता है। इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए और एक नए देश बांग्लादेश का जन्म हुआ। पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने अपनी पूरी सेना के सामने समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर किए। उनके सामने थे लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा। 1971 युद्ध के हीरो। आज ही के दिन 2005 में उनका निधन हो गया।

देश-दुनिया में 3 मई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है-

2019: ओडिशा में तूफान ‘फानी’ का कहर। 33 लोगों की मौत हुई। चेतावनी के बाद सरकार ने हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला।

2008: पाकिस्तानी जेल में सजा काट रहे भारतीय कैदी सरबजीत सिंह की फांसी टली।

1993: संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की घोषणा की।

1913: पहली भारतीय फीचर फिल्म राजा हरिश्चन्द्र प्रदर्शित हुई।

1845: चीन के कैंटन में थियेटर में आग लगने से 1600 लोगों की मौत हुई।

खबरें और भी हैं…



Source link

Share:

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
Share on linkedin
Share on whatsapp

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *